शान्ति पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
तमागतं द्विजं दृष्ट्वा विस्मितो गौतमोऽभवत् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
तमागतं प्रय़त्नेन प्रत्युद्गम्याभिवाद्य च |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
तमागतमभिप्रेक्ष्य कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
तमागतमभिप्रेक्ष्य देवा इन्द्रपुरोगमाः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२८
गर्दभ्यु उवाच
तमागतमभिप्रेक्ष्य पिता वाक्यमथाव्रवीत् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
तमागतमभिप्रेक्ष्य प्रत्युद्गम्य परन्तपाः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
तमागतमभिप्रेक्ष्य भगवान्कश्यपस्तदा |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
तमागतमभिप्रेक्ष्य भीमकर्माणमाहवे |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
तमागतमभिप्रेक्ष्य वसिष्ठः श्रेष्ठभागृषिः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
भीष्म उवाच
तमागतमभिप्रेक्ष्य शिष्यं वाक्यमथाव्रवीत् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
तमागतमहं श्रुत्वा विषय़ान्तं महावलम् |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
तमागतमृषिं दृष्ट्वा नारदं सर्वधर्मवित् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
तमागतमृषिं वृद्धं वहुवर्षसहस्रिणम् |
४० क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
तमागम्य महाप्राज्ञः कृष्णद्वैपाय़नोऽव्रवीत् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
तमागम्य मुदा युक्तस्तस्याधस्तादुपाविशत् ||
१४ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
तमाचार्यसुतः क्रुद्धः साश्वय़न्तारमाशुगैः |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
तमाचार्यो महाराज विद्ध्वा पञ्चभिराशुगैः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
तमाचार्योऽप्यसम्भ्रान्तोऽय़ोधय़च्छत्रुतापनः ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
तमाचार्योऽव्रवीत्कर्णं शनकैः प्रहसन्निव |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
तमाजिशीर्षमाय़ान्तं दहन्तं क्षत्रिय़र्षभान् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
तमाजिशीर्षादेकान्तमपक्रान्तं निशाम्य तु |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
तमाज्ञाय़ मुनिः क्रोधं नैवास्य चुकुपे ततः |
६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
तमात्तकार्मुकं दृष्ट्वा व्रह्मचारिणमव्ययम् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तमात्तचक्रं प्रणदन्तमुच्चैः; क्रुद्धं महेन्द्रावरजं समीक्ष्य |
९१ क
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
तमात्मजान्तकरणं पिता पुत्रवधार्दितः |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
तमादाय़ नरव्याघ्र सम्प्राप्तास्मि तवान्तिकम् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
तमादाय़ाथ रक्षांसि द्रुतं मेरुव्रजं यय़ुः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
तमादाय़ैहि काकुत्स्थ त्वरावान्भव मा चिरम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
तमादिकालेषु महाविभूति; र्नाराय़णो व्रह्ममहानिधानम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
तमादित्यमिवोद्यन्तमनाधृष्यं महावलम् |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
तमादित्योऽनुपर्येति सततं ज्योतिषां पतिः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
तमाद्रवत मा भैष्ट क्षिप्रं रक्षत कौरवम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२७४
मार्कण्डेय़ उवाच
तमाद्रवन्तं सङ्क्रुद्धं मैन्दनीलनलाङ्गदाः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
तमाद्रवन्तं सम्प्रेक्ष्य गर्जन्तमिव तोय़दम् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
तमाधिरथिराक्रन्दं विज्ञाय़ शरणैषिणाम् |
५० क
वन पर्व
अध्याय
७६
वृहदश्व उवाच
तमानाय़्य नलो राजा क्षमय़ामास पार्थिवम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
तमानीतं नृपं दृष्ट्वा रात्रौ संहत्य दानवाः |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
तमानीतं सरस्वत्या दृष्ट्वा कोपसमन्वितः |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
तमानय़ यथोद्दिष्टं पूजा कार्या हि तस्य मे ||
८ ग
वन पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
तमानय़स्व धर्मज्ञं मम भ्रातरमाशु वै |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
तमापतन्तं त्वरितं गजेन्द्रं; धनञ्जय़ः कुम्भविभागमध्ये |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
तमापतन्तं ददृशे पृथग्जनो; विमुक्तमभ्रादिव सूर्यमण्डलम् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
च्यवन उवाच
तमापतन्तं दृष्ट्वैव च्यवनस्तपसान्वितः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
१४०
वैशम्पाय़न उवाच
तमापतन्तं दृष्ट्वैव तथा विकृतदर्शनम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
तमापतन्तं द्विरदं दृष्ट्वा क्रुद्धमिवान्तकम् |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
तमापतन्तं नकुलं सोऽभिपत्य; समन्ततः साय़कैरभ्यविध्यत् |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
तमापतन्तं नरवीरमुग्रं; महाहवे वाणसहस्रधारिणम् |
५६ क
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
तमापतन्तं पत्त्यश्वैः क्रुद्धो राजा युधिष्ठिरः |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
तमापतन्तं परिघं कार्तस्वरविभूषितम् |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तमापतन्तं प्रगृहीतचक्रं; समीक्ष्य देवं द्विपदां वरिष्ठम् |
९३ क