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द्रोण पर्व
अध्याय १३८
सञ्जय़ उवाच
तमसा संवृते लोके रजसा च महीपते |
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३६
सञ्जय़ उवाच
तमसा संवृते लोके व्यद्रवत्सर्वतोमुखी ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
तमसा हि प्रतिच्छन्नं विभ्रान्तमिव चातुरम् |
५ क
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
तमसाभिप्लुते लोके रजसा चैव भारत |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
तमसिं प्रेषय़ामास कृतवर्मरथं प्रति ||
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३६
व्रह्मो उवाच
तमसो मिथुनं सत्त्वं सत्त्वस्य मिथुनं रजः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
तमसो लक्षणानीह भक्षाणामभिरोचनम् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
तमसो व्रह्म सम्भूतं तमोमूलमृतात्मकम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७५
भृगुरु उवाच
तमसोऽन्ते जलं प्राहुर्जलस्यान्तेऽग्निरेव च ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३६
श्रीभगवानु उवाच
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय २५५
अर्जुन उवाच
तमस्मिन्समरोद्देशे न पश्यामि जय़द्रथम् ||
३७ ख
सभा पर्व
अध्याय ४९
दुर्योधन उवाच
तमस्मै शङ्खमाहार्षीद्वारुणं कलशोदधिः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
तमस्य कर्णश्चिच्छेद त्रिभिश्चैनमताडय़त् ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
तमस्य विशिखैः कर्णो व्यधमत्कुञ्जरं पुनः |
६५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
तमस्य हर्षं ममृषे न पाण्डवो; विभेद मर्माणि ततोऽस्य मर्मवित् |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय ३६
श्रीभगवानु उवाच
तमस्येतानि जाय़न्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
तमहं कीर्तय़िष्यामि तथैव प्रथितो भवेत् ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
तमहं कीर्तय़िष्यामि सर्वभूतहितं शुभम् ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय २०
द्रौपद्यु उवाच
तमहं कुपिता भीम पुनः कोपं निय़म्य च |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
तमहं गीर्भिरिष्टाभिः पुनः पुनररिन्दमम् |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
तमहं जातु नास्येय़मन्यस्मिन्फल्गुनादृते |
६० क
शान्ति पर्व
अध्याय १८५
भरद्वाज उवाच
तमहं ज्ञातुमिच्छामि तद्भवान्वक्तुमर्हति ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १४७
भीम उवाच
तमहं ज्ञानविज्ञेय़ं नावमन्ये न लङ्घय़े ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
युधिष्ठिर उवाच
तमहं तत्त्वतो ज्ञातुमिच्छामि वदतां वर ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
तमहं ते प्रवक्ष्यामि तं मे शृणु समाहिता ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
तमहं दृष्टवान्देवं कोऽन्यो धन्यतरो मय़ा ||
१८० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
वासुदेव उवाच
तमहं द्रष्टुमिच्छामि संमते तव फल्गुन ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
तमहं नृपतिं दीनमव्रुवं पुनरेव तु |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
तमहं पतिता काक नान्यं जानामि कञ्चन |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
तमहं प्रणम्य शिरसा भूय़ो व्राह्मणसत्तमम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
तमहं प्राञ्जलिर्भूत्वा नमस्कृत्येदमव्रुवम् |
१२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
तमहं प्राञ्जलिर्भूत्वा मृगपक्षिष्वथाग्निषु |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
तमहं फलार्थिनं मन्ये भ्रातरं तर्कचक्षुषा |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
तमहं भारमासक्तमनाधृष्यं दुरात्मभिः |
५३ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
तमहं यत्रतत्रस्थं द्रष्टुमिच्छामि सूर्यजम् |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६
व्यास उवाच
तमहं यष्टुमिच्छामि सम्भाराः सम्भृताश्च मे |
५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३८
कुन्त्यु उवाच
तमहं रक्षती विप्रं शापादनपराधिनम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३४
मातो उवाच
तमहं वेद नान्यस्तमुपसम्पादय़ामि ते ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ९९
वैशम्पाय़न उवाच
तमहं शापभीता च पितुर्भीता च भारत |
९ क
वन पर्व
अध्याय ८०
भीष्म उवाच
तमहं श्रोतुमिच्छामि पृथक्सङ्कीर्तितं त्वय़ा ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
तमहं संशितात्मानं सर्वय़त्नैरतोषय़म् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५१
सञ्जय़ उवाच
तमहं सगणं राजन्सवाजिरथकुञ्जरम् |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
तमहं समरे हत्वा गमिष्यामि यथागतम् ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
भीष्म उवाच
तमहं स्मय़न्निव रणे प्रत्यभाषं व्यवस्थितम् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
भीष्म उवाच
तमहं स्मय़न्निव रणे प्रत्यभाषं व्यवस्थितम् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
तमांसीव यथा सूर्यो वृक्षानग्निर्घनान्खगः |
७० क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
तमाकलितकेशान्तं ददृशुः सर्वपार्थिवाः |
५५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
तमाक्रम्य तदा राजन्कण्ठे चोरसि चोभय़ोः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
तमाक्रम्यानय़ामास प्रतिषिद्धो यमेन यः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
तमाक्षिपद्भीमसेनो वलेन वलिनां वरः ||
५७ ख