कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
तमभ्यधावन्नकुलः प्रवीरो; रोषादमित्रं प्रतुदन्पृषत्कैः |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
तमभ्यधावन्निहते कुमारे; कैकेय़सेनापतिरुग्रधन्वा |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
तमभ्यनन्दद्भारतं पुष्कलाभि; र्वाग्भिर्ज्येष्ठं पाण्डवं यादवाग्र्यः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
तमभ्ययाच्छैलसुता भूतस्त्रीगणसंवृता |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
तमभ्ययात्प्रहर्षेण नरेन्द्रः सह भार्यया |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
तमभ्ययाद्वृहत्क्षत्रः केकय़ानां महारथः |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
तमभ्ययान्महासेनः सुरशत्रुमुदारधीः |
७२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
तमभ्यर्च्य महावाहुः कुरुराजो युधिष्ठिरः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
तमभ्यर्च्य यथान्याय़ं धर्मराजो युधिष्ठिरः |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
तमभ्याशगतं प्राज्ञो रणे प्रेक्ष्य वृकोदरः |
३३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
तमभ्याशगतं राजा जरासन्धात्मजात्मजः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
तमभ्याशगतं राजा पदातिं कुन्तिनन्दनः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२७२
मार्कण्डेय़ उवाच
तमभ्याशगतं वीरमङ्गदं रावणात्मजः |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
तमभ्येत्य शनैर्वह्निरुवाच कुरुनन्दनम् |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
तमभ्येत्य सहामात्यः परिष्वज्य नृपात्मजम् |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
तमभ्येत्यात्मजस्तुभ्यमश्वत्थामानमव्रवीत् ||
१६ ग
वन पर्व
अध्याय
२७१
मार्कण्डेय़ उवाच
तमभ्येत्याशु हरय़ः परिवार्य समन्ततः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
तमभ्येहि पुरा प्राणान्स विमुञ्चति धर्मवित् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
तमम्वष्ठोऽस्थिभेदिन्या निरविध्यच्छलाकय़ा |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
तमर्कमिव तेजोभिः सौवर्णमिव पर्वतम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
तमर्कमिव दुष्प्रेक्ष्यं तपन्तं रश्मिमालिनम् |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
मनुरु उवाच
तमर्घ्यादिभिरभ्यर्च्य भार्गवं सोऽसुराधिपः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
तमर्चितं सर्वदाशार्हपूगै; राशीर्भिरर्कज्वलनप्रकाशम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
तमर्चितं सुविष्वस्तमासीनमृषिसत्तमम् |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
तमर्चित्वा मूलफलैरासनेनोदकेन च |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तमर्चय़ित्वा देवेशं गमनादेव सिध्यति ||
१४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८२
पराशर उवाच
तमर्चय़ित्वा वैश्यस्तु कुर्यादत्यर्थमृद्धिमत् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
तमर्जुनं महेष्वासं महेन्द्रोपेन्द्ररक्षितम् |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
तमर्जुनः पृषत्कानां शतेन भरतर्षभ |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
तमर्जुनः पृषत्कानां शतैः षड्भिरताडय़त् |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
तमर्जुनः प्रत्यविध्यच्छिताग्रैः; कक्षान्तरे दशभिरतीव क्रुद्धः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
तमर्जुनः प्रत्यविध्यद्दशभिर्मर्मवेधिभिः ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
तमर्जुनः प्रत्युवाच प्रसादात्तव माधव |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
तमर्जुनः शतेनैव पत्रिणामभ्यताडय़त् |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
तमर्जुनः शितेनाजौ राजन्विव्याध पत्रिणा |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
तमर्जुनः समाश्वास्य पुनरेवेदमव्रवीत् |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
तमर्जुनस्तांश्च पुनस्त्वदीय़ा; नभ्यर्दितस्तैरविकृत्तशस्त्रैः |
६३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
तमर्जुनस्तु विंशत्या विव्याध युधि भारत ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
तमर्जुनो नवत्या तु शराणां नतपर्वणाम् |
३७ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
तमर्थं प्रतिजल्पन्त्याः कृष्णाय़ाः कीचकेन ह |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
तमर्थमभिपद्यस्व मा राजन्नीनशः प्रजाः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
तमर्थमावेद्य यदव्रवीन्मां; विद्याधरेन्द्रस्य सुता भृशार्ता |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
तमवस्थितमाज्ञाय़ पुत्रस्ते भरतर्षभ |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
तमवारय़दाचार्यो वेलेवोद्वृत्तमर्णवम् ||
७७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
तमविध्यच्छितैर्वाणैः कङ्कपत्रैर्युधिष्ठिरः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
तमविध्यत्त्रिभिर्वाणैर्दन्दशूकैरिवाहिभिः |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
तमविध्यदमेय़ात्मा तव पुत्रोऽत्यमर्षणः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
तमवोचत्किल पृथा पुनः पृथुलवक्षसम् |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीच्छान्तनवः प्रहस्य; क्व ते गता वुद्धिरभूत्क्व वीर्यम् ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीच्छान्तनवः शिरो मे तात लम्वते |
३९ क