आदि पर्व
अध्याय
१७०
गन्धर्व उवाच
तपसोग्रेण महता नन्दय़िष्यन्पितामहान् ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
तपसोग्रेण सा लव्ध्वा तेन रेमे सहाच्युत ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४३
व्यास उवाच
तपसोपनिषत्त्यागस्त्यागस्योपनिषत्सुखम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
मातलिरु उवाच
तपसोऽन्ते ततस्ताभ्यां स्वय़म्भूरददाद्वरम् ||
६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
७८
वसिष्ठ उवाच
तपसोऽन्ते महाराज गावो लोकपराय़णाः ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
तपसोऽर्धं प्रय़च्छामि पाणिग्राहस्य सत्तमाः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
४१
सूत उवाच
तपसोऽस्य चतुर्थेन तृतीय़ेनापि वा पुनः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
तपसोऽस्य सुतप्तस्य तथा सुचरितस्य च |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
तपस्तप्तुमथारेभे पत्यर्थमसुखा ततः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
अम्वो उवाच
तपस्तप्तुमभीप्सामि तापसैः परिपालिता ||
१२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
द्रोण उवाच
तपस्तप्त्वा तु याँल्लोकान्प्राप्नुवन्ति तपस्विनः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
१६९
मातलिरु उवाच
तपस्तप्त्वा महत्तीव्रं प्रसाद्य च पितामहम् |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
तपस्तप्त्वा वरं प्राप्तं कृतमन्धं स्वय़म्भुवा ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२७
सूत उवाच
तपस्तप्त्वा व्रतपरा स्नाता पुंसवने शुचिः |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तपस्तु तप्यमानास्ते भवन्ति ह्यूर्ध्वरेतसः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तपस्ते वर्धतां भूय़ः पितृभक्त्या विशेषतः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तपस्ते वर्धतां विप्र मत्प्रसादात्सहस्रधा ||
११३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३७
ऋषिरु उवाच
तपस्ते वर्धतां विप्र मत्प्रसादात्सहस्रधा |
४८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५२
वासुदेव उवाच
तपस्ते सुमहद्दीप्तं गुरवश्चापि तोषिताः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
तपस्तेपतुरव्यग्रौ विसृज्य त्रिदिवौकसः ||
६६ ग
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
तपस्तेपे ततो घोरं वेदज्ञानाय़ पाण्डव ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
तपस्तेपे ततो देवान्निय़माद्वशमानय़त् ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
तपस्तेपे परमकं येनातुष्यत्पितामहः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वासुदेव उवाच
तपस्तेपे महावाहो वदर्यां वहुवत्सरम् ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
तपस्तेपे सुतस्यार्थे सभार्यः कुरुनन्दन ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
तपस्त्यागश्च योगश्च स वै सर्वमवाप्नुय़ात् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
तपस्त्यागो विधिरिति निश्चय़स्तात धीमताम् |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
ऋषय़ ऊचुः
तपस्त्वन्ये प्रशंसन्ति स्वाध्याय़मपरे जनाः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
तपस्यग्निषु धर्मेषु मृगपक्षिषु चानघाः |
६६ ख
वन पर्व
अध्याय
१९२
विष्णुरु उवाच
तपस्यति तपो घोरं शृणु यस्तं हनिष्यति ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
तपस्यभिरतं शान्तं जमदग्निं शमात्मकम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
तपस्यभिरतो धीमाञ्जगामारण्यमेव ह ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
तपस्यभिरतो धीमान्न दारानभ्यकाङ्क्षत ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
तपस्युग्रे वर्तमान उग्रतेजा महामनाः ||
२० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
तपस्येवानुरक्तं मे मनः सर्वात्मना तथा ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
तपस्विजनजुष्टां च ततो वेदीं प्रजापतेः |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
५९
विदुर उवाच
तपस्विनं सम्परिपूर्णविद्यं; भषन्ति हैवं श्वनराः सदैव ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२५२
वैशम्पाय़न उवाच
तपस्विनं सम्परिपूर्णविद्यं; भषन्ति हैवं श्वनराः सुवीर ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३०
व्यास उवाच
तपस्विनः प्रशान्ताश्च सत्त्वस्थाश्च कृते युगे ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
तपस्विनः सत्यशीलाः शतशः संशितव्रताः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
तपस्विनमतीवाथ तं मुनिप्रवरं नृप |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
२०८
वैशम्पाय़न उवाच
तपस्विनस्ततोऽपृच्छत्प्राज्ञलिः कुरुनन्दनः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
वसिष्ठ उवाच
तपस्विनस्तपस्विन्या तेजस्विन्यातितेजसः |
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
तपस्विनस्तपोनिष्ठास्तेषां भैक्षचराश्च ये |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
तपस्विनां धर्मवतां विदुषां चोपसेवनात् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१९
वदान्य उवाच
तपस्विनीं महाभागां वृद्धां दीक्षामनुष्ठिताम् |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
तपस्विनो धर्मपथे स्थितस्य द्विजसत्तम ||
३८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
तपस्विनो धृतिमतः प्रमोदः समुपागतः ||
६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
भीष्म उवाच
तपस्विनो धृतिमतः श्रुतिविज्ञानचक्षुषः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
तपस्विनो धृतिमतो धर्मज्ञस्य यशस्विनः ||
१५ ख