वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
तन्मा शठः कितवः प्रत्यदेवी; त्सुय़ोधनार्थं सुवलस्य पुत्रः ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
तन्मा शुचो भारत दिष्टमेत; त्पर्याय़सिद्धिर्न सदास्ति सिद्धिः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
तन्मां त्वं भगवन्वक्तुं प्रव्राजय़ितुमर्हसि ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
तन्मां दहति यत्कृष्णा सभाय़ां कुरुसंनिधौ |
५६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
तन्मां दहति विप्रर्षे यथा सुविदितं तव ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
तन्मात्रमपि नो मह्यं न ददाति पुरा भवान् ||
५९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
तन्मानितः पार्थिवोऽय़ं सदैव; त्वय़ा सभीमेन तथा यमाभ्याम् |
६६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
तन्माभिनन्द्यं वीभत्सो किमर्थं नाभिनन्दसे ||
३२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
तन्मामद्यैव पश्यन्तु पाण्डवाः संशितव्रतम् |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
तन्मामेवंविधं जानन्समर्थमरिनिग्रहे |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
तन्मामेवङ्गते साधो न यावय़ितुमर्हसि |
१८० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
तन्मित्रं यत्र विश्वासः स देशो यत्र जीव्यते ||
९२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
तन्मिथ्या न हि मे कृत्स्नं प्रभावं वेत्थ भारत ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय
४४
शकुनिरु उवाच
तन्मिथ्या भ्रातरो हीमे सहाय़ास्ते महारथाः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
तन्मिथ्याकरणं सर्वं विस्तरेणापि मे शृणु ||
१४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
तन्मूलं काममूलस्य प्रजनस्येति मे मतिः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
तन्मूलं सर्वधर्माणां धर्ममूलाः पुनः प्रजाः ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
तन्मूलः स महाराज प्रावर्तत जनक्षय़ः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
२४
गरुड उवाच
तन्मे कारणतो मातः पृच्छतो वक्तुमर्हसि ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
अम्वो उवाच
तन्मे कार्यतमं कार्यमिति मे भगवन्मतिः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
२८४
कर्ण उवाच
तन्मे कीर्तिकरं लोके तस्याकीर्तिर्भविष्यति ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
तन्मे त्वय़ा कच्चिदमोघमद्य; ध्यातं कृतं कर्णनिपातनेन ||
४३ ख
विराट पर्व
अध्याय
२०
भीमसेन उवाच
तन्मे दहति कल्याणि हृदि शल्यमिवार्पितम् |
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
धृतराष्ट्र उवाच
तन्मे दहति गात्राणि तदकार्षीत्प्रजागरम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
तन्मे दहति गात्राणि तूलराशिमिवानलः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
तन्मे दहति गात्राणि तूलराशिमिवानलः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
तन्मे दहति गात्राणि यन्मां गुरुरभाषत |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
तन्मे दहति गात्राणि शुष्कवृक्षमिवानलः |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
तन्मे दहति गात्राणि सखे सत्येन ते शपे ||
७१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
तन्मे धर्मं यशश्चाग्र्यमाय़ुश्चैवाददद्भवः ||
१४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
शुक उवाच
तन्मे धर्मभृतां श्रेष्ठ यथावद्वक्तुमर्हसि ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
पुत्र उवाच
तन्मे परिणतप्रज्ञे सम्यक्प्रव्रूहि पृच्छते |
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
८५
अष्टक उवाच
तन्मे पृष्टः शंस सर्वं यथाव; च्छुभाँल्लोकान्येन गच्छेत्क्रमेण ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
तन्मे प्रीणाति हृदय़ममृतप्राशनोपमम् ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
तन्मे भय़ं त्वं भगवन्व्यपनेतुमिहार्हसि ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
८४
अष्टक उवाच
तन्मे राजन्व्रूहि सर्वं यथाव; त्क्षेत्रज्ञवद्भाषसे त्वं हि धर्मान् ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
अर्जुन उवाच
तन्मे राजा प्रोक्तवांस्ते समक्षं; धनुर्देहीत्यसकृद्वृष्णिसिंह ||
६२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
धृतराष्ट्र उवाच
तन्मे वद महावाहो श्रोतव्यं यदि वै मय़ा ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२८७
वैशम्पाय़न उवाच
तन्मे वाक्यं न मिथ्या त्वं कर्तुमर्हसि कर्हिचित् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
तन्मे विलपमानस्य वचनं समुपेक्षसे |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
४६
जनमेजय़ उवाच
तन्मे व्रूहि महाप्राज्ञ कुशलो ह्यसि सत्तम ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
धृतराष्ट्र उवाच
तन्मे व्रूहि महाप्राज्ञ शुश्रूषे वचनं तव ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
उमो उवाच
तन्मे व्रूहि महाभाग देवदेव पिनाकधृक् ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३९
युधिष्ठिर उवाच
तन्मे व्रूहि महावाहो कुरूणां वंशवर्धन ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
तन्मे व्रूहि महावाहो श्रोतव्यं यदि मन्यसे ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४१
धृतराष्ट्र उवाच
तन्मे शुश्रूषवे व्रूहि विचित्राणि हि भाषसे ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५२
युधिष्ठिर उवाच
तन्मे शृणु महावाहो श्रुत्वा चाख्यातुमर्हसि ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
राजो उवाच
तन्मे सत्तम तत्त्वेन वक्तुमर्हसि पृच्छतः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
युधिष्ठिर उवाच
तन्मे सर्वं यथातत्त्वं प्रव्रूहि भरतर्षभ ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
तन्मे सर्वं समाचक्ष्व कुशलो ह्यसि सञ्जय़ ||
४३ ख