chevron_left  तद्रक्षःarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
तद्रक्षः समरे विद्धं कृत्वा नादं भय़ावहम् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
तद्रक्षो द्विगुणं चक्रे नदन्तं भैरवान्रवान् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ६
सूत उवाच
तद्रक्षो भस्मसाद्भूतं पपात परिमुच्य ताम् ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
तद्रजः पुरुषव्याघ्र शोणितेन प्रशामितम् |
४१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
तद्रजस्तुमुलं घोरं क्षणेनान्तरधीय़त ||
१२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२
व्यास उवाच
तद्राजञ्जीवमानस्त्वं प्राय़श्चित्तं चरिष्यसि |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
तद्राजन्राजसिंहानां नान्यो धर्मः सनातनः |
४२ क
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
तद्राजा धर्मतश्चक्रे राज्यपालनकीर्तिमान् ||
५८ ख
सभा पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
तद्राज्ञः संनिगृह्य त्वं रुद्राय़ोपजिहीर्षसि ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १३३
वैशम्पाय़न उवाच
तद्राज्यं पितृतः प्राप्तं धृतराष्ट्रो न मृष्यते |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
तद्रामो ह्यददान्मह्यं येन योत्स्यामि पाण्डवम् ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
तद्रूपं कदलीषण्डं छादय़न्नमितद्युतिः |
४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
तद्रूपं तस्य ते दृष्ट्वा क्षत्रिय़ाः शत्रुकर्शनाः |
४३ क
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
तद्रूपं दर्शय़ामास यद्वै सागरलङ्घने ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
तद्रूपं महदालक्ष्य भ्रातुः कौरवनन्दनः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
तद्रूपधारिणं रुद्रं रौद्रकर्म चिकीर्षवः |
५१ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
तद्रूपमपरं वस्त्रं प्रादुरासीदनेकशः ||
४१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४३
जनमेजय़ उवाच
तद्रूपवेषवय़सं श्रद्दध्यां सर्वमेव ते ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
तद्रेतः स तु जग्राह कलशे वै महातपाः |
३१ क
सभा पर्व
अध्याय ५१
दुर्योधन उवाच
तद्रोचतां शकुनेर्वाक्यमद्य; सभां क्षिप्रं त्वमिहाज्ञापय़स्व ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४८
नागभार्यो उवाच
तद्रोषं सहजं त्यक्त्वा त्वमेनं द्रष्टुमर्हसि |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
तद्वचः पूजय़ित्वा तु तथेत्याह स पार्थिवः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४२
भीष्म उवाच
तद्वचः स प्रतिश्रुत्य वाक्यमाह विहङ्गमः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
तद्वचः सङ्गतं श्रुत्वा लोमशो युक्तमर्थवत् |
७४ क
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
तद्वचः सत्यमित्येव मौर्ख्याद्दर्पाच्च मन्यते ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
तद्वचः सत्यमेवास्तु जहि पार्थान्समागतान् |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
तद्वचः सर्वधर्मज्ञा धार्मिकस्य निशम्य ते |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
तद्वचो भीमसेनस्य प्रिय़ं श्रुत्वा विशां पते |
४४ क
शल्य पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
तद्वचो भीमसेनस्य सर्व एवाभ्यपूजय़न् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९६
मनुरु उवाच
तद्वच्छरीरनिर्मुक्तः फलैर्युज्यति कर्मणः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९६
मनुरु उवाच
तद्वच्छरीरनिर्मुक्तः शरीरी नोपलभ्यते ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९६
मनुरु उवाच
तद्वच्छरीरसंय़ुक्तः शरीरीत्युपलभ्यते ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९५
मनुरु उवाच
तद्वच्छरीरेषु भवन्ति पञ्च; ज्ञानैकदेशः परमः स तेभ्यः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९५
मनुरु उवाच
तद्वच्छरीरोदरपाणिपादं; छित्त्वा न पश्यन्ति ततो यदन्यत् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
भीष्म उवाच
तद्वज्जलदवत्सर्प कालस्याहं वशानुगः ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
तद्वज्जातवलो योगी दीप्ततेजा महावलः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
तद्वज्जातिशतैर्जीवः शुध्यतेऽल्पेन कर्मणा |
१२ क
मौसल पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वज्रभूतं मुसलं व्यदृश्यत तदा दृढम् ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे; स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९९
मनुरु उवाच
तद्वत्कीटपतङ्गेषु प्रसक्तात्मा स्वकर्मभिः ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय ४१
शिशुपाल उवाच
तद्वत्त्वमप्यधर्मज्ञ सदा वाचः प्रभाषसे ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९७
मनुरु उवाच
तद्वत्प्रसन्नेन्द्रिय़वाञ्ज्ञेय़ं ज्ञानेन पश्यति ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
गुरुरु उवाच
तद्वत्संसारकान्तारमातिष्ठञ्श्रमतत्परः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
तद्वत्संसारसूत्रं हि तृष्णासूच्या निवध्यते ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९५
मनुरु उवाच
तद्वत्सुवुद्धिः सममिन्द्रिय़त्वा; द्वुधः परं पश्यति स्वं स्वभावम् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ४८
सूत उवाच
तद्वत्से व्रूहि वत्सं स्वं कुमारं वृद्धसंमतम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
तद्वत्सोमगुणा जिह्वा गन्धस्तु पृथिवीगुणः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय २९९
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वत्स्यामो वय़ं छन्नास्तदनुज्ञातुमर्हथ ||
४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
तद्वदर्थान्मनुष्येभ्य आदद्यादविहिंसय़ा ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०४
गुरुरु उवाच
तद्वदव्यक्तजा भावाः कर्तुः कारणलक्षणाः |
४ क