द्रोण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
तं श्रुत्वा शङ्खनिर्घोषं पाण्डवस्य महात्मनः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
तं श्रुत्वा सुमहानादं तव सैन्यस्य भारत |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
तं श्रुत्वा सुमहानादं भीमसेनस्य धन्विनः |
३३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
तं शय़ानं नृपश्रेष्ठं ततो भरतसत्तम |
१८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
तं शय़ानं महात्मानं भूमौ स्वरुधिरोक्षितम् |
६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तं शय़ानं महात्मानं विस्रव्धमकुतोभय़म् |
१४ क
मौसल पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
तं शय़ानं महात्मानं वीरमानकदुन्दुभिम् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
तं षड्भिः साय़कैर्द्रोणः साश्वय़न्तारमार्दय़त् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
तं स कृष्णानिलोद्धूतो दिव्यास्त्रजलदो महान् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
तं स गोमाय़ुरालोक्य स्नेहादागतसम्भ्रमम् |
७१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४५
भीष्म उवाच
तं स तेन यथोद्दिष्टं नागं विप्रेण व्राह्मणः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
तं स भीमः प्रजाकामस्तोषय़ामास धर्मवित् |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
तं स राजा महाप्राज्ञ संश्रित्य किल सर्वशः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
तं स विद्ध्वा महाराज शाल्वो रुक्मिणिनन्दनम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
तं स विप्रोऽव्रवीत्क्रुद्धो वाचा निर्भर्त्सय़न्निव |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
तं स संय़ुज्य शापेन मण्डूकं पावको यय़ौ |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
तं संमथितसर्वाङ्गं मांसपिण्डोपमं कृतम् |
६० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
वृहस्पतिरु उवाच
तं संवर्तो याजय़ितेति मे श्रुतं; तदिच्छामि न स तं याजय़ेत ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२०
वैशम्पाय़न उवाच
तं सङ्कल्पं विदित्वास्य ज्ञात्वा पुत्रांश्च वालकान् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
तं सत्यधृतिमाय़ान्तमरुणाः समुदावहन् ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
कुन्त्यु उवाच
तं सत्यसन्धं वीभत्सुं सव्यसाचिनमच्युत |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
तं सत्यसन्धं सहिताभिपेतु; र्दिदृक्षवश्चारणसिद्धसङ्घाः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
तं सदाचारमाश्चर्यं पुराणं शाश्वतं ध्रुवम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
तं सदाचारमाश्चर्यं पुराणं शाश्वतं ध्रुवम् |
७६ क
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
तं सदाध्युषितं यक्षैर्द्रक्ष्यामो गिरिमुत्तमम् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
तं सदारो विनीतात्मा सुग्रीवः प्लवगाधिपः |
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
तं सन्तो विधिवत्प्राप्य गच्छन्ति परमां गतिम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
तं सन्धिमास्थाय़ सतां सकाशे; को नाम जह्यादिह राज्यहेतोः |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
तं सभाय़ां महाराजमासीनं राष्ट्रवर्धनम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१६२
वैशम्पाय़न उवाच
तं समन्तादनुय़युर्गन्धर्वाप्सरसस्तथा |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
ऋषभ उवाच
तं समानाय़्य पुत्रं तु तदोपालभ्य पार्थिवम् |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
तं समामष्टमीमुष्टं राजा वव्रे स्वय़ं तदा |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
तं समारुह्य शैनेय़स्तव सैन्यमुपाद्रवत् |
८२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
तं समासाद्य पाञ्चाला भीष्मं नासन्पराङ्मुखाः ||
९६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
तं समासाद्य मेधावी स तदा द्विजसत्तमः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
तं समासाद्य वित्रस्ता कृष्णा कमललोचना |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
तं समासीनमागम्य मण्डलं कापिलं महत् |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
तं समीक्ष्य ततः कर्णो व्रह्मास्त्रेण धनञ्जय़म् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१६२
गन्धर्व उवाच
तं समुत्थापय़ामास नृपतिं काममोहितम् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०
सूत उवाच
तं समुद्रमतिक्रम्य कद्रूर्विनतय़ा सह |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२९
व्राह्मण उवाच
तं समुद्रो नमस्कृत्य कृताञ्जलिरुवाच ह |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
तं समेत्य रणं त्यक्त्वा किं वक्ष्यामि महारथम् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२३
वासुदेव उवाच
तं सर्वगुणसम्पन्नं दक्षं शुचिमकातरम् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
तं सर्वगुणसम्पन्नं श्रीवत्सकृतलक्षणम् |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५२
धृतराष्ट्र उवाच
तं सर्वगुणसम्पन्नं समिद्धमिव पावकम् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
तं सर्वतः शकुनिः पार्वतीय़ैः; सार्धं गान्धारैः पाति गान्धारराजः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
तं सर्वभावोपगता पतिशुश्रूषणे रता ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
तं सर्वे संश्रय़िष्यन्ति प्राकारमकुतोभय़म् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
तं सर्वे संश्रय़िष्यामः प्राकारमकुतोभय़म् |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
तं सशालचय़ग्रामं सम्प्रतोलीविटङ्किनम् |
१२ क