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भीष्म पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
तदा देहैर्देहवन्तो व्यतिरोहन्ति नान्यथा ||
८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ६५
इन्द्र उवाच
तदा धर्मो न चलते सद्भूतः शाश्वतः परः ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
तदा धारय़ितुं शेकुराक्रान्तां दानवैर्वलात् ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
तदा नरा नरव्याघ्र तस्मिञ्जनपदेश्वरे ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
तदा नश्यति मे क्रोधः पादौ तस्य निरीक्ष्य ह |
४१ क
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
तदा निःक्षत्रिय़ा भूमिर्भविष्यति न संशय़ः ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
तदा निःक्षत्रिय़े लोके भार्गवेण कृते सति |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
तदा निमन्त्रकस्तस्या अङ्गेभ्यः क्षिप्रमागमत् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
मुनिरु उवाच
तदा निर्विद्यते सोऽर्थात्परिभग्नक्रमो नरः ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
वासुदेव उवाच
तदा निय़ोजय़ामासुर्वचने वाक्यकोविदम् ||
४७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
तदा नैरृतमुख्येभ्यस्त्रैलोक्ये पावकात्मजः ||
९० ख
वन पर्व
अध्याय २३७
दुर्योधन उवाच
तदा नो नसमं युद्धमभवत्सह खेचरैः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १००
पृथिव्यु उवाच
तदा पश्चात्प्रकुर्वीत निवृत्ते श्राद्धकर्मणि ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
तदा पादप्रहारेण भीमः कम्पय़ते द्रुमम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
तदा पितामहात्सोमादेतं धर्ममजानत |
१५ ख
वन पर्व
अध्याय ११३
लोमश उवाच
तदा पुनर्लोभय़ितुं जगाम; सा वेशय़ोषा मुनिमृश्यशृङ्गम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४०
व्यास उवाच
तदा प्रकाशते ह्यात्मा घटे दीप इव ज्वलन् |
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
तदा प्रकाशतेऽस्यात्मा घटे दीपो ज्वलन्निव ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
तदा प्रकृतिमानेष भवत्यव्यक्तलोचनः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
तदा प्रकृतिमापन्नं युक्तमाहुर्मनीषिणः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९८
मनुरु उवाच
तदा प्रज्ञाय़ते व्रह्म ध्यानय़ोगसमाधिना ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९८
मनुरु उवाच
तदा प्रज्ञाय़ते व्रह्म निकष्यं निकषे यथा ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
तदा प्रणेदुश्च जहर्षिरे च ते; कुरुप्रवीराय़ च चक्रुरञ्जलीन् ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय १३१
श्येन उवाच
तदा प्रदेय़ं तन्मह्यं सा मे तुष्टिर्भविष्यति ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
तदा प्रभृति कृष्णस्त्वां न तथा वहु मन्यते ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १०९
लोमश उवाच
तदा प्रभृति कौन्तेय़ नरा गिरिमिमं सदा |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १९५
भीष्म उवाच
तदा प्रभृति गान्धारे न शक्नोम्यभिवीक्षितुम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ५१
वृहदश्व उवाच
तदा प्रभृति नस्वस्था नलं प्रति वभूव सा ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
तदा प्रभृति मर्यादा स्थितेय़मिति नः श्रुतम् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११५
धृतराष्ट्र उवाच
तदा प्रभृति मा शोको दहत्यग्निरिवाशय़म् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ७२
देवय़ान्यु उवाच
तदा प्रभृति या प्रीतिस्तां त्वमेव स्मरस्व मे ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
तदा प्रवक्ष्यतः शास्त्रं युष्मन्मतिभिरुद्धृतम् ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय २
शौनक उवाच
तदा प्रादुर्भवत्येषां पूर्वसङ्कल्पजं मनः ||
६३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
तदा प्रादुश्चकारोग्रमस्त्रमस्त्रविदां वरः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
तदा भवति लोकस्य मर्यादा सुव्यवस्थिता ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
तदा भवति लोकस्य मर्यादा सुव्यवस्थिता ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
तदा भवति सत्त्वस्थस्ततो व्रह्म समश्नुते ||
३२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
तदा भीमं हृदा राजन्नपध्याति स पार्थिवः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
तदा मनस्ते त्रिदिवादिवाशुचे; र्निवर्ततां पार्थ महीप्रशासनात् |
४१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
तदा मरौ भविष्यन्ति जलपूर्णाः पय़ोधराः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
तदा मातलिना यत्ता व्यचरन्नल्पका इव ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
तदा मूढो धृतराष्ट्रस्य पुत्र; स्तप्ता युद्धे दुर्मतिर्दुःसहाय़ः |
४८ क
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
तदा मे चिरदृष्टः स भ्राता गृध्रपतिः प्रिय़ः |
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४८
वासुदेव उवाच
तदा मय़ा समानीय़ भेदिताः सर्वपार्थिवाः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
तदा यज्ञावसानं तद्भविष्यति जनार्दन ||
४८ ख
आदि पर्व
अध्याय २०९
व्राह्मण उवाच
तदा यूय़ं पुनः सर्वाः स्वरूपं प्रतिपत्स्यथ |
१० क
वन पर्व
अध्याय १२०
युधिष्ठिर उवाच
तदा रणे त्वं च शिनिप्रवीर; सुय़ोधनं जेष्यसि केशवश्च ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
तदा राजन्धार्तराष्ट्रानाविवेश महद्भय़म् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय ८२
शक्र उवाच
तदा राज्यं सम्प्रदाय़ैव तस्मै; त्वय़ा किमुक्तः कथय़ेह सत्यम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९५
वामदेव उवाच
तदा लिप्सेत मेधावी परभूमिं धनान्युत ||
६ ख