आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
तदहं पितुरावेद्य भृशं प्रव्यथितेन्द्रिय़ा |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१५०
कुन्त्यु उवाच
तदहं प्रज्ञय़ा स्मृत्वा वलं भीमस्य पाण्डव |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
तदहं प्रेक्ष्य दैत्यानां पुरमद्भुतदर्शनम् |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रय़तात्मनः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
तदहं भ्रातृसहितः सर्वान्विज्ञापय़ामि वः |
३२ क
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
तदहं यष्टुमिच्छामि दाशार्ह सहितस्त्वय़ा |
२० क
विराट पर्व
अध्याय
३८
उत्तर उवाच
तदहं राजपुत्रः सन्स्पृशेय़ं पाणिना कथम् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१६८
अर्जुन उवाच
तदहं वज्रसङ्काशैः शरैरिन्द्रास्त्रचोदितैः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
तदहं वुद्धिमास्थाय़ भय़ं मोक्ष्ये समीरणात् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
तदहं वै करिष्यामि नात्र कार्या विचारणा ||
१०८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
युधिष्ठिर उवाच
तदहं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तः कुरुपितामह ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
युधिष्ठिर उवाच
तदहं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तोऽद्य भरतर्षभ ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
भीष्म उवाच
तदहं श्रोतुमिच्छामि दण्ड उत्पद्यते कथम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
भीष्म उवाच
तदहं श्रोतुमिच्छामि सर्वमेतदसंशय़म् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११४
भीष्म उवाच
तदहं श्रोतुमिच्छामि सर्वासामेव वो मतम् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वासुदेव उवाच
तदहं सज्जनमुखान्निःसृतं तत्समागमे |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
व्यास उवाच
तदहं स्थानमत्यन्तं मार्गय़िष्यामि केवलम् ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
तदहः पितरश्चैनमूचुर्जहि मृगानिति |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
तदहमनुनिशाम्य विप्रय़ातं; पृथगभिपन्नमिहावुधैर्मनुष्यैः |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
तदहितनिहतं वभौ वलं; पितृपतिराष्ट्रमिव प्रजाक्षय़े ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
तदहृष्टमिवाकूजं गतोत्सवमिवाभवत् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
तदा करिष्यथ मम प्रिय़ाणि च हितानि च ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
तदा किल त्वय़ा द्रौणिः क्रुद्धेनोक्तोऽरिमर्दन ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
१३०
दुर्योधन उवाच
तदा कुन्ती सहापत्या पुनरेष्यति भारत ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
तदा कुरूणां हृदय़ानि चापत; न्वभूव हाहेति च निस्वनो महान् ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
तदा कृतय़ुगं नाम कालः श्रेष्ठः प्रवर्तते ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
तदा कृतय़ुगं नाम कालः श्रेष्ठः प्रवर्तते ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२११
वैशम्पाय़न उवाच
तदा कोलाहले तस्मिन्वर्तमाने महाशुभे |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ||
५२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५३
वासुदेव उवाच
तदा गन्धर्ववच्चेष्टाः सर्वाश्चेष्टामि भार्गव ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
तदा गृहीतः कौरव्य निश्चेष्टः समपद्यत ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
तदा गोवर्धनो भीष्म न तच्चित्रं मतं मम ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भृगुरु उवाच
तदा गौणमनन्तस्य नामानन्तेति विश्रुतम् |
३२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
तदा च कृष्णसांनिध्यमासाद्य भरतर्षभ |
१४ क
मौसल पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
तदा च भारते युद्धे प्राप्ता चाद्य क्षय़ाय़ नः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
तदा तच्च वनं चान्यन्निर्दहत्याशु तेजसा ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
तदा तदा प्रपश्यन्ति तस्माद्वुध्यस्व भारत ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
तदा तद्वेश्म ते पित्रा तेजसाभिविदीपितम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
तदा तमनुपश्येत यस्मिन्दृष्टे तु कथ्यते |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
तदा तमाश्रय़ल्लक्ष्मीः स्वय़ं देवी शरीरिणी ||
४८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
तदा तस्याथ भषतः शुनः सप्त शरान्मुखे |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२४२
वैशम्पाय़न उवाच
तदा तु नृपतिर्गन्ता धर्मराजो युधिष्ठिरः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भृगुरु उवाच
तदा तु पातय़ित्वा तं नहुषं भूतले भृगुः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
भीष्म उवाच
तदा तेषां स्पृहय़ते ये वै तुष्टाः स्वकैर्धनैः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४२
व्यास उवाच
तदा त्वमात्मनात्मानं परं द्रक्ष्यसि शाश्वतम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
तदा दातास्मि ते तात दिव्यान्यस्त्राणि सर्वशः ||
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
वृहस्पतिरु उवाच
तदा देवाः पितरोऽथर्षय़श्च; गन्धर्वसङ्घाश्च समेत्य सर्वे ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
तदा देवासुरे घोरे भय़े जाते दिवौकसाम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
भीष्म उवाच
तदा देवासुरे युद्धे जेताहं त्वां शतक्रतो ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
२०२
व्याध उवाच
तदा देही देहमन्यं व्यतिरोहति कालतः ||
९ ख