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भीष्म पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
तथैव राक्षसो राजन्माधवं निशितैः शरैः |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
तथैव राजन्कर्णोऽपि पार्षतं शत्रुतापनम् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९७
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव राजा कौन्तेय़ो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव राजा मत्स्यानां विराटो वाहिनीपतिः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
तथैव राजा वाह्लीको राजानं द्रुपदं शरैः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय २११
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव राजा वृष्णीनामुग्रसेनः प्रतापवान् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
तथैव लक्ष्मणो राजन्सौभद्रं निशितैः शरैः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
तथैव लोमहर्षाच्च पुराणमवधारितम् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
तथैव वंशकर्तारस्तव तेजोविवर्धनाः |
४८ क
वन पर्व
अध्याय २९२
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव वद्धकवचं कनकोज्ज्वलकुण्डलम् |
५ क
विराट पर्व
अध्याय ५५
कर्ण उवाच
तथैव वद्धमात्मानमवद्धमिव मन्यसे ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव वनदुर्गेषु पुष्पितद्रुमसानुषु |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव वनराजीनामुदारान्रचितानिव |
५९ क
आदि पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव वस्त्राणि च भूषणानि; प्रभावय़ुक्तानि महाधनानि ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ३६
भीमसेन उवाच
तथैव वहवोऽस्माभी राष्ट्रेभ्यो विप्रवासिताः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३८
पञ्चचूडो उवाच
तथैव वहु मन्यन्ते यथा रत्यामनुग्रहम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
तथैव वहुरूपत्वाद्विश्वरूप इति स्मृतः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
तथैव वागुरां छित्त्वा वलवन्तो यथा मृगाः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
तथैव वाच्यं भवता हि मद्वचः; समागतेषु क्षितिपेषु सर्वशः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय १९९
द्रुपद उवाच
तथैव वासुदेवस्य पाण्डुपुत्रा न संशय़ः ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव वासुदेवोऽपि स्वस्रीय़स्य महात्मनः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
तथैव विदुरं व्रूय़ाः कुरूणां मन्त्रधारिणम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३८
व्यास उवाच
तथैव विदुषां ज्ञानं पुत्रहेतोः समुद्धृतम् |
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
तथैव विन्ध्यपुलकाः पुलिन्दाः कल्कलैः सह ||
६० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
नारद उवाच
तथैव विप्रप्रवरान्नमस्कृत्य यतव्रतान् |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १००
पृथिव्यु उवाच
तथैव विश्वेदेवेभ्यो वलिमाकाशतो हरेत् |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
तथैव वुद्ध्या विहितं विश्वकर्मकृतं शुभम् |
६७ क
वन पर्व
अध्याय १६८
अर्जुन उवाच
तथैव वृत्रस्य वधे सङ्गृहीता हय़ा मय़ा |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
तथैव वृष्णिवीरेऽपि सात्वते युद्धदुर्मदे ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव वेदवचनं श्रूय़ते नित्यदा विभो |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
तथैव वेदशास्त्राणि लोकधर्मांश्च शाश्वतान् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५५
भीष्म उवाच
तथैव वेदानृषय़स्तपसा प्रतिपेदिरे ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
तथैव वेदानृषय़स्तपसा प्रतिपेदिरे ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
तथैव वेदाश्चतुरो हय़ाग्र्या; धरा सशैला च रथो महात्मन् |
१०३ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव वेद्यां कृष्णापि जज्ञे तेजस्विनी शुभा |
९२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
तथैव व्यक्तमात्मानमव्यक्तं प्रतिपद्यते ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
तथैव व्यभिचारेण न वर्तन्ते परस्परम् |
१०० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
तथैव शकुनिः शूरः स्यालस्तव विशां पते |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
तथैव शक्रप्रतिमानकल्प; मिन्द्रात्मजं द्रोणमुखाभिसस्रुः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९४
सञ्जय़ उवाच
तथैव शक्रप्रतिमोऽपि सात्यकिः; सुदर्शने यान्क्षिपति स्म साय़कान् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
तथैव शरजालानि भीष्मेणास्तानि मारिष |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
तथैव शरवर्षाणि धृष्टद्युम्नोऽभ्यवर्षत ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
तथैव शरवर्षाणि प्रतिमुञ्चन्नविह्वलः |
१० ख
वन पर्व
अध्याय २३३
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव शरवर्षेण गन्धर्वास्ते वलोत्कटाः |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
तथैव शरवर्षेण भास्करो रश्मिवानिव |
१२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
तथैव शव्दो भुवनेष्वभूत्तदा; जना व्यवस्यन्व्यथिताश्च चस्खलुः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय ११७
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव शिरसा भूमावभिवाद्य प्रणम्य च |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव शीलेन समाधिना च; प्रीताः सुरा मे सहिताः सहेन्द्राः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
तथैव स ऋषिस्तात कालधर्ममवाप्य ह |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव स गिरिर्भूय़ः प्रपुष्पितलताद्रुमः |
२१ क