शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
तथा सूर्याभिनिर्मुक्तः कुनखी श्यावदन्नपि ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
तथा सेनां कृतां दृष्ट्वा तव पुत्रेण कौरव |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
तथा सेनामुखे तत्र निहते पार्थ पाण्डवैः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
तथा स्कन्दोऽजय़च्छत्रून्स्वेन वीर्येण कीर्तिमान् ||
७० ख
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
तथा स्त्रिय़ं वै यो हन्ति वृद्धं वालं तथैव च |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय
३६
अर्जुन उवाच
तथा स्त्रीषु प्रतिश्रुत्य पौरुषं पुरुषेषु च |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
तथा स्थण्डिलशाय़ी च ये चान्ये निय़माः पृथक् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
तथा स्पर्शे तथा रूपे तथैव रसगन्धय़ोः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
तथा स्फीतो जनपदो मुदितश्च भविष्यति ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
६८
भीमसेन उवाच
तथा स्मारय़िता तेऽहं कृन्तन्मर्माणि संय़ुगे ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
युधिष्ठिर उवाच
तथा स्याच्छीलसम्पत्त्या यामिच्छेत्पुरुषः स्त्रिय़म् ||
३४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
तथा स्याद्विपुलं पुण्यं शुद्धेन मनसा कृतम् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
व्यास उवाच
तथा स्वकर्मनिर्वृत्तं न पुण्यं न च पापकम् ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
तथा स्वकाय़े प्रक्षिप्य मनो द्वारैरनिश्चलैः |
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
तथा स्वर्गश्च भोगश्च निष्ठा या च मनीषिता |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
तथा स्वलङ्कृतद्वारं नगरं पाण्डुनन्दनः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
तथा हतासु माय़ासु त्रस्तोऽर्जुनशराहतः |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
तथा हि कथय़न्तौ तौ भूय़ः शुश्रुवतुः स्वनम् |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
तथा हि कुरवः सर्वे लोभमोहपराय़णाः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
तथा हि त्वच्छरीरेऽस्मिन्निमां वत्स्यामि शर्वरीम् ||
१८९ ख
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
तथा हि दानवा घोरा विनिघ्नन्ति दिवौकसः ||
५० ख
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
तथा हि दृष्ट्वा वीभत्सुमुपाय़ान्तं प्रशंसति |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१३१
राजो उवाच
तथा हि धर्मसंय़ुक्तं वहु चित्रं प्रभाषसे ||
१३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
तथा हि नाग्रहीः प्राप्तं समीपेऽद्य युधिष्ठिरम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१३८
शूद्र उवाच
तथा हि निहतः शेते राक्षसेन वलीय़सा ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
तथा हि नो मन्यतेऽजातशत्रुः; संसिद्धार्थो द्विषतां निग्रहाय़ |
९४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
तथा हि मुखवर्णोऽय़मनय़ोरिति मेनिरे |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
तथा हि मुसलैर्हन्युः शरीरं तत्पुनर्भवेत् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
तथा हि मृत्युं जय़ति तत्परेणान्तरात्मना ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
कृष्ण उवाच
तथा हि मे वचः कर्ण नोपैति हृदय़ं तव ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
तथा हि युधि विक्रान्तो दहति क्षत्रिय़र्षभान् ||
५५ ख
सभा पर्व
अध्याय
४३
दुर्योधन उवाच
तथा हि रत्नान्यादाय़ विविधानि नृपा नृपम् |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
तथा हि रथिनः सर्वे ह्रिय़न्ते विद्रुतैर्हय़ैः ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
६९
वृहदश्व उवाच
तथा हि लक्षणं वीरे वाहुके दृश्यते महत् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३४
युधिष्ठिर उवाच
तथा हि वर्तते मन्दः सुय़ोधनमते स्थितः ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
तथा हि वलवान्राजा जरासन्धो महाद्युतिः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
तथा हि वहुलां सेनां स विभर्ति नरर्षभः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२
वलदेव उवाच
तथा हि शक्यो धृतराष्ट्रपुत्रः; स्वार्थे निय़ोक्तुं पुरुषेण तेन ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
तथा हि शरवर्षाणि पातय़त्यनिशं प्रभो |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१९६
कर्ण उवाच
तथा हि सर्वमादाय़ राज्यमस्य जिहीर्षति ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
तथा हि सुमहद्राजन्हृषीकेशप्रवेशने ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
तथा हि हृष्टाः क्रोशन्ति शोककालेऽपि पाण्डवाः ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
तथा ह्यनेकैर्मुनिभिर्महान्तः क्रतवः कृताः ||
१० ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
धृतराष्ट्र उवाच
तथा ह्यन्तर्हिते तस्मिन्कूटय़ोधिनि राक्षसे |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
तथा ह्यभिनिवेशोऽय़ं वासुदेवस्य भारत ||
३० ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
तथा ह्यभिमुखः शेते शय़ने वीरसेविते ||
११ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
तथा ह्यवस्थिता भाति पुत्रं चाप्यभिवीक्ष्य सा ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
तथा ह्यसौ मुनिरिह निर्विशेषवा; न्स निर्गुणं प्रविशति व्रह्म चाव्ययम् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
तथा ह्यसौ सुखदुःखे विहाय़; मुक्तः परार्ध्यां गतिमेत्यलिङ्गः ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
७
विदुर उवाच
तथा ह्यस्म्यागतः क्षिप्रं त्वद्दर्शनपराय़णः ||
२१ ख