वन पर्व
अध्याय
१२५
लोमश उवाच
तथा मदं विनिष्क्षिप्य शक्रं सन्तर्प्य चेन्दुना |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
तथा मद्राधिपस्यापि गदावेगं महात्मनः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
तथा मद्राधिपस्यापि गदावेगं महात्मनः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
भीष्म उवाच
तथा मध्यन्दिने सूर्यो अस्तमेति यदा तदा |
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
तथा मध्यमिकाय़ांश्च वाटधानान्द्विजानथ |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
तथा मनुष्योऽय़मिति कदाचित्सुरसत्तमाः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
तथा मनोऽभिय़ोगाद्वै शरीरं प्रतिकर्षति ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
तथा मन्त्रविदो विप्रास्तपस्तप्त्वा सुदुष्करम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
तथा मन्दारवृक्षैश्च पुष्पितैरुपशोभितान् ||
२६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
तथा ममापि तनय़ं प्रय़च्छ वलशालिनम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
तथा मर्त्यार्णवे जन्तोः कर्मविज्ञानतो गतिः ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
तथा मर्मातिगैर्भीष्मो निजघान महारथान् |
७८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
वैशम्पाय़न उवाच
तथा महर्षे वर्तामि किं प्रलापः करिष्यति ||
३८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
तथा महात्मनस्तस्य तपस्युग्रे च वर्ततः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
३२
शेष उवाच
तथा महीं धारय़ितास्मि निश्चलां; प्रय़च्छ तां मे शिरसि प्रजापते ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय
४०
उत्तर उवाच
तथा मां विद्धि सारथ्ये शिक्षितं नरपुङ्गव ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
तथा मांसं च मेदश्च स्नाय़्वस्थीनि च पोषति ||
३७ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
तथा माता हितं वाक्यं भाषमाणा हितैषिणी |
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
तथा मान्यश्च पूज्यश्च भूय़ो मम वृहस्पतिः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
तथा मामभिजानाति सूतश्चाधिरथः सुतम् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तथा माल्यवतः शृङ्गे दीप्यते तत्र हव्यवाट् |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तथा माल्यवतः शृङ्गे पूर्वे पूर्वान्तगण्डिका |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
तथा माहिष्मतीवासी नीलो नीलाय़ुधैः सह |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
तथा माय़ां प्रय़ुञ्जानमसह्यं व्राह्मणव्रुवम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
तथा मुमूर्षुमासीनमकूजन्तमचेतसम् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
तथा मुह्यामि च व्रह्मन्कार्यवत्तां विचिन्तय़न् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
५४
सूत उवाच
तथा मूर्धावसिक्तैश्च नानाजनपदेश्वरैः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
तथा मूलफलं भैक्षं पर्याय़ेणोपय़ोजय़ेत् ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
तथा मृतः शिशुरय़ं जीवतामभिमन्युजः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
तथा मे नारदः प्राह व्यासश्च सुमहातपाः |
४३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४३
जनमेजय़ उवाच
तथा मे सर्वमाचक्ष्व परं कौतूहलं हि मे ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३९
व्यास उवाच
तथा मोहः प्रमादश्च तन्द्री निद्राप्रवोधिता |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
तथा म्लेच्छगणांश्चान्यान्वहून्युद्धविशारदान् ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
तथा मय़ा चाप्यसकृद्वार्यमाणो न गृह्णसि |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
तथा मय़ा विधातव्यं त्वय़ा चैव विशेषतः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
तथा मय़ाप्यभ्यधिकं मृषा वक्तुं न शक्यते ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
तथा यः प्रतिहन्त्यस्य शासनं विषय़े नरः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
५०
आस्तीक उवाच
तथा यज्ञोऽय़ं तव भारताग्र्य; पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रिय़ेभ्यः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
५०
आस्तीक उवाच
तथा यज्ञोऽय़ं तव भारताग्र्य; पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रिय़ेभ्यः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
५०
आस्तीक उवाच
तथा यज्ञोऽय़ं तव भारताग्र्य; पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रिय़ेभ्यः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५०
आस्तीक उवाच
तथा यज्ञोऽय़ं तव भारताग्र्य; पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रिय़ेभ्यः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
५०
आस्तीक उवाच
तथा यज्ञोऽय़ं तव भारताग्र्य; पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रिय़ेभ्यः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
५०
आस्तीक उवाच
तथा यज्ञोऽय़ं तव भारताग्र्य; पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रिय़ेभ्यः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
५०
आस्तीक उवाच
तथा यज्ञोऽय़ं तव भारताग्र्य; पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रिय़ेभ्यः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
अप्सरस ऊचुः
तथा यत्नं करिष्यामः शक्र तस्य प्रलोभने |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१३५
यवक्रीरु उवाच
तथा यदि ममापीदं मन्यसे पाकशासन ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
तथा यद्ग्रामकृत्यं स्याद्ग्रामिकृत्यं च ते स्वय़म् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१३
जरत्कारुरु उवाच
तथा यद्युपलप्स्यामि करिष्ये नान्यथा त्वहम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
तथा यमौ चाप्यसुखौ सुखार्हौ; समृद्धरूपावमरौ दिवीव |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
तथा यवनकाम्वोजा मथुरामभितश्च ये |
५ क