द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
तं मत्तमिव सिंहेन राजन्कुञ्जरमर्दितम् |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
तं मत्स्यमनय़द्वापीं महतीं स मनुस्तदा ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२८३
मार्कण्डेय़ उवाच
तं मन्त्रिणा हतं श्रुत्वा ससहाय़ं सवान्धवम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
भीष्म उवाच
तं मन्यन्ते धनय़ुताः कृपणैः सम्प्रवर्तितम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
तं मन्ये निकृतिप्रज्ञं यो मोक्षं प्रत्यनन्तरम् |
१४१ क
विराट पर्व
अध्याय
४०
उत्तर उवाच
तं मन्ये मेघपुष्पस्य जवेन सदृशं हय़म् ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४४
सनत्सुजात उवाच
तं मन्येत पितरं मातरं च; तस्मै न द्रुह्येत्कृतमस्य जानन् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
तं ममाचक्ष्व वार्ष्णेय़ कथमद्य वृकोदरः ||
२७ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
तं ममाचक्ष्व वीभत्सो यथा कर्णो हतस्त्वय़ा ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
भीष्म उवाच
तं ममानुग्रहकृते दातुमर्हस्यनिन्दित |
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तं महात्मा महात्मानं गदामुद्यम्य पाण्डवः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
तं महात्मा स्वय़ं प्रीत्या देव्या सह महाद्युतिः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
तं महान्तमुपाय़ान्तं धनेश्वरमुपान्तिके |
२९ क
विराट पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
तं महास्त्रैर्महावीर्यं परिवार्य धनञ्जय़म् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
तं महीपा महीपालं राजराज्येऽभ्यषेचय़न् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
तं महोत्सवसङ्काशं भीमरूपधरं पुनः |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
तं महोत्सवसङ्काशमतिहृष्टजनाकुलम् |
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
तं महौघमिवाय़ान्तं खात्पतन्तमिवोरगम् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
तं मां महाफलं विद्धि पदं सुकृतकर्मणः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
१२८
लोमश उवाच
तं मातरः प्रत्यकर्षन्गृहीत्वा दक्षिणे करे |
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
तं माता पुनरेवान्यमेकं पुत्रमय़ाचत |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तं माता प्रत्युवाच |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तं माता रोरूय़माणमुवाच |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
तं माता वा पिता वेद भूतार्थो मातरि स्थितः ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
तं माद्र्यनुजगामैका वसनं विभ्रती शुभम् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
दुर्योधन उवाच
तं मामनार्यपुरुषं मित्रद्रुहमधार्मिकम् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
तं मार्गमाणा भर्तारं दह्यमाना दिनक्षपाः |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
तं मित्रं सर्वभूतानां मनुः स्वाय़म्भुवोऽव्रवीत् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
तं मुक्तकेशाः करुणं रुदन्त; श्चितामध्ये काष्ठमिव क्षिपन्ति ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
तं मुदाभिसमागम्य सत्कृत्य च यथाविधि |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
तं मुनिं दर्शय़ामास नारदं विश्वरूपधृक् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
तं मुनिः शरभं चक्रे वलोत्कटमरिन्दम |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
तं मुमोच महेष्वासः क्रुद्धः कर्णजिघांसय़ा ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
तं मुमोचय़िषुर्वज्री वातवर्षेण पाण्डवम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
तं मुहूर्तं क्षणं वेलां दिवसं च युय़ोज ह ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६७
शकुन्तलो उवाच
तं मुहूर्तं प्रतीक्षस्व स मां तुभ्यं प्रदास्यति ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
तं मुहूर्तादिवागम्य राज्ञो मन्त्री कृताञ्जलिः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
तं मृगेन्द्रमिवाय़ान्तं प्रभिन्नमिव वारणम् |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१३६
भरद्वाज उवाच
तं मृतं पुत्रमादाय़ विललाप ततः पिता ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
तं मृधे वेगमास्थाय़ परं परमधन्विनः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
७६
देवय़ान्यु उवाच
तं मे त्वमग्रहीरग्रे वृणोमि त्वामहं ततः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
तं मे शृणु महाभागे धर्मज्ञे धर्ममादितः ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
तं मे शृणु यथातत्त्वं यश्चास्य विधिरुत्तमः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
तं मेरुशिखरप्रख्यं मेघदुन्दुभिनिस्वनम् |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
तं मोक्षय़ महावाहो न गच्छेद्द्विषतां वशम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२३७
दुर्योधन उवाच
तं मोक्षय़त भद्रं वः सहदारं नराधिपम् |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
तं मोचय़ महावाहो पार्षतं शत्रुतापनम् |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
तं यज्ञं स महासत्त्वोऽदहत्कक्षमिवानलः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
तं यज्ञं सुमहातेजा भीमैरनुचरैस्तदा |
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
१३६
भरद्वाज उवाच
तं यथा पुत्र नाभ्येषि तथा कुर्यास्त्वतन्द्रितः ||
१५ ख