वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
तत्र स्म पीना दृश्यन्ते वाहवः परिघोपमाः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
तत्र स्म भ्राजते भैमी सर्वाभरणभूषिता |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
तत्र स्म मत्ता मातङ्गा धर्मार्ताः श्रमकर्शिताः |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
४६
दुर्योधन उवाच
तत्र स्म यदि शक्तः स्यां पातय़ेय़ं वृकोदरम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
१८४
सरस्वत्यु उवाच
तत्र स्म रम्या विपुला विशोकाः; सुपुष्पिताः पुष्करिण्यः सुपुण्याः |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
तत्र स्म राक्षसी गाति सदा कृष्णचतुर्दशीम् |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
तत्र स्म राक्षसी घोरा जरा नामाशुविक्रमा |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१८३
अत्रिरु उवाच
तत्र स्म वाचं कल्याणीं धर्मकामार्थसंहिताम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र स्म सूदाः क्रोशन्ति सुमृष्टमणिकुण्डलाः |
१२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
तत्र स्मान्तर्हिता वाचो व्यचरन्त पुनः पुनः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
१११
वेश्यो उवाच
तत्र स्वधर्मोऽनभिवादनं नो; न चोदकं पाद्यमुपस्पृशामः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
तत्र स्वाध्याय़संश्लिष्टमेकाग्रं धारय़ेन्मनः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
तत्र स्वय़म्प्रभा देवी नित्यं वसति शाण्डिली ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
तत्र हंसप्रपतनं तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् |
८२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र हत्वा पुरा विष्णुरसुरौ मधुकैटभौ |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
तत्र हर्षकला वाचो नराणां शुश्रुवेऽर्जुनः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
तत्र हि द्यूतमाय़ातं विजय़ाय़ेतराय़ वा ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय
४८
सूत उवाच
तत्र होता वभूवाथ व्राह्मणश्चण्डभार्गवः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
तत्र ह्यगस्त्यः पादेन वहन्स्पृष्टो मय़ा मुनिः |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
१७५
व्राह्मणा ऊचुः
तत्र ह्यद्भुतसङ्काशो भविता सुमहोत्सवः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
तत्र ह्यनेकमाय़त्तं राज्ञो भवति भारत ||
७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१८५
भृगुरु उवाच
तत्र ह्यपापकर्माणः शुचय़ोऽत्यन्तनिर्मलाः |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ह्यमरराजोऽसावीजे क्रतुशतेन ह |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
जनमेजय़ उवाच
तत्र ह्याय़ाति धनद आर्ष्टिषेणो यथाव्रवीत् ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रर्षय़ः सप्त जाता जज्ञिरे मरुतां गणाः ||
३१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
तत्रस्थं त्वां न संसोढुं शक्ता देवाः सवासवाः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
८४
यय़ातिरु उवाच
तत्रस्थं मां देवसुखेषु सक्तं; कालेऽतीते महति ततोऽतिमात्रम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्रस्थं स तु धर्मात्मा समागच्छद्विभीषणः |
४६ क
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रस्थः पुरुषैरेव धर्मराजस्य शासनात् |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रस्थः प्रेषय़ामास वासुदेवाय़ चाभिभुः |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रस्थमेव तं राजन्धनानि निधय़स्तथा |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रस्थश्चापि शुश्राव हतं शल्यं हलाय़ुधः |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रस्थश्चिन्तय़ामास दैत्यदानवविग्रहम् ||
६ ग
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रस्थानृषिसङ्घांस्तानभिवाद्य हलाय़ुधः |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
माण्डव्य उवाच
तत्रस्थेन स्तुतो देवः प्राह मां वै महेश्वरः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
तत्रस्थोऽथ महीपालो योधय़ामास तां पुरीम् |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
तत्राकरोद्दुष्करं राजपुत्रो; दुःशासनस्तुमुले युध्यमानः |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
तत्राकरोन्महाराज कदनं सूतनन्दनः |
१०० क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्राकर्षत्ततो नावं स मत्स्यः कुरुनन्दन ||
४४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राकुर्वन्त विपुलं नादं वध्यत्सु शत्रुषु |
६७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
तत्राक्रन्दो महानासीत्तव तेषां च भारत |
४३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
तत्राक्रन्दो महानासीत्तावकानां महात्मनाम् |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
तत्राक्रन्दो महानासीत्पाञ्चालानां महारणे |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
तत्राक्रन्दो महानासीत्पाण्डवानां विशां पते |
९९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
तत्राक्रन्दो महानासीत्सृञ्जय़ानां महात्मनाम् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
तत्राक्रुध्यद्भीमसेनो धृष्टद्युम्नस्य मारिष |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्राक्षय़वटो नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतः |
७२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
भीष्म उवाच
तत्रागच्छत्परां वृद्धिं राजपुत्रः फलाशनात् ||
९ ग
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रागच्छन्द्विजा राजन्सर्ववेदविदां वराः |
३७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
तत्रागच्छेः सहामात्यो मातृभ्यां सहितो नृप ||
२४ ख