अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
तत्र देवो गिरितटे दिव्यधातुविभूषिते |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
तत्र देवो गिरितटे हेमधातुविभूषिते |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
तत्र देवो महादेवस्तत्राग्निर्वाय़ुना सह |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
तत्र देवो मुदा युक्तो भूतसङ्घशतैर्वृतः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१९
वदान्य उवाच
तत्र देव्या तपस्तप्तं शङ्करार्थं सुदुश्चरम् |
२० क
विराट पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र देशे भविष्यन्ति यत्र राजा युधिष्ठिरः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र दैवं तु विधिना कालय़ुक्तेन लभ्यते ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
तत्र दैवतकन्याभिरासनेनोपचर्यते |
७४ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
द्रौपद्यु उवाच
तत्र दोषः परिहृतो भविष्यति न संशय़ः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
तत्र द्यूतमभवन्नो जघन्यं; तस्मिञ्जिताः प्रव्रजिताश्च सर्वे |
१२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३९
व्यास उवाच
तत्र द्रक्ष्यथ तान्सर्वान्ये हतास्मिन्रणाजिरे ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
तत्र द्वौ दारुणौ दोषौ तमो नाम रजस्तथा ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
तत्र धर्मं प्रवक्ष्यामि सुखी भवति येन वै |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र धर्मपरो ह्यासीत्त्रितः स सुमहातपाः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
तत्र धर्मविदां तात निश्चय़ो धर्मनैपुणे |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
तत्र धर्मार्थकामा हि मोक्षः पश्चाच्च कीर्तितः |
३० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र धर्म्याः कथास्तात चक्रुस्ते परमर्षय़ः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र धृतराष्ट्रस्य राज्ञः पुत्रशतं वभूव गान्धार्यां वरदानाद्द्वैपाय़नस्य ||
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३२
भीष्म उवाच
तत्र न व्यवधातव्यं परोक्षा धर्मय़ापना ||
१ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
तत्र नः प्रथमः कल्पो यद्वय़ं ते च माधव |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५०
नाग उवाच
तत्र नः संशय़ो जातस्तय़ोस्तेजःसमागमे |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र नागसहस्राणि हय़ानामय़ुतानि च |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र नागा महाकाय़ा ज्वलितास्याः सुदारुणाः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
तत्र नागा रथाश्चैव जाम्वूनदपरिष्कृताः |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
तत्र नागा रथाश्चैव जाम्वूनदविभूषिताः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
तत्र नागा रथाश्चैव जाम्वूनदविभूषिताः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
तत्र नागा हय़ा योधा रथिनोऽथ पदातय़ः |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
तत्र नादो महानासीत्पाण्डवानां विशां पते |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
तत्र नानाजलचरा विनिष्पिष्टा महाद्रिणा |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र नानाप्रकारेषु विमानेषु स्वलङ्कृताः |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र नानाविधाकाराः कथाः समनुकीर्त्य वै |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
तत्र नाराय़णपरा मानवाश्चन्द्रवर्चसः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
१५
सूत उवाच
तत्र नाराय़णो देवो व्रह्माणमिदमव्रवीत् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
तत्र नास्नातकः कश्चिन्न चासीदव्रती द्विजः |
६ क
विराट पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र नाहं तथा मन्ये यथाय़मितरो जनः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र निक्षिप्य तान्सर्वानुवाच भरतर्षभः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्र नित्यं निवसति व्रह्मा देवगणैर्वृतः ||
५३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
तत्र नित्यं निवसति स्वय़ं देवः प्रजापतिः ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र निर्जित्य सङ्ग्रामे मानुषान्दैवतांस्तथा |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र नीलेन राज्ञा स चक्रे युद्धं नरर्षभः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
३५
सूत उवाच
तत्र नेत्रमभून्नागो वासुकिर्वलिनां वरः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
तत्र नैवानुतप्यन्ते प्राज्ञा निश्चितनिश्चय़ाः |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
तत्र नो ग्लहमानानां ध्रुवौ तात जय़ाजय़ौ ||
१९ ग
वन पर्व
अध्याय
२९८
युधिष्ठिर उवाच
तत्र नो नाभिजानीय़ुर्वसतो मनुजाः क्वचित् ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
ऋषय़ ऊचुः
तत्र नो विहता प्रज्ञा मनश्च वहुलीकृतम् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र न्याय़्यमिदं कर्तुं भारावतरणं मय़ा ||
३१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
तत्र पक्वकषाय़ो हि दान्तः सर्वत्र सिध्यति ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
४९
सूत उवाच
तत्र पञ्चत्वमापन्नाः प्रेतलोकं गमिष्यथ ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
तत्र पञ्चशिखो नाम कापिलेय़ो महामुनिः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४१
व्यास उवाच
तत्र पश्य कुशलानशोचतो; ये विदुस्तदुभय़ं कृताकृतम् ||
१३ ख