भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
तत्र गच्छत भद्रं वो राजानं परिरक्षत ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
तत्र गच्छत यत्रैते युध्यन्ते मामका रथाः ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
तत्र गच्छन्ति कर्माग्र्यं कृत्वा शमदमात्मकम् |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र गच्छन्ति भद्रं ते सदा पर्वणि पर्वणि ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
५१
वृहदश्व उवाच
तत्र गच्छन्ति राजानो राजपुत्राश्च सर्वशः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
तत्र गच्छन्ति राजानो राजपुत्राश्च सर्वशः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२४२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र गच्छन्ति राजानो व्राह्मणाश्च ततस्ततः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
तत्र गच्छन्ति सिद्धाश्च चारणा दैवतानि च |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
तत्र गच्छन्तु वहवः प्रवरा रथसत्तमाः |
५७ क
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
तत्र गच्छस्व भद्रं ते यथाकामं द्विजोत्तम ||
४१ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
तत्र गच्छस्व भद्रं ते व्रूय़ाश्चैनं वचो मम |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
तत्र गच्छस्व माद्रेय़ गृहं वा यदि मन्यसे ||
१५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
तत्र गच्छस्व राम त्वं त्वरितं युद्धदुर्मद |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
शुक उवाच
तत्र गच्छस्व वै तूर्णं यदि ते हृदि संशय़ः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
तत्र गच्छाम भद्रं वो राजानं परिरक्षितुम् |
६० क
उद्योग पर्व
अध्याय
११५
गालव उवाच
तत्र गच्छावहे भद्रे शनैरागच्छ मा शुचः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१३२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र गत्वा चतुःशालं गृहं परमसंवृतम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र गत्वा पुनर्नेमं लोकमाय़ान्ति भारत ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र गत्वा महात्मानौ कृष्णौ परपुरञ्जय़ौ |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र गत्वा महाराज वलः श्वेतानुलेपनः |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र गत्वा मुनीन्दृष्ट्वा नानावेषधरान्वलः |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
तत्र गत्वा मय़ा सार्धं पर्युपासन्त तां शुभाम् ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
व्यास उवाच
तत्र गत्वा यथोक्तं स पुर्या द्वारे महाय़शाः |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र गत्वा स जग्राह गदां शङ्खं च भारत |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१९८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र गत्वा स धर्मज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
तत्र गत्वा हृषीकेशः कल्पय़ामास सूतवत् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र गन्धर्वराजो वै पूर्वमेव विशां पते |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र गर्गं महाभागमृषय़ः सुव्रता नृप |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र गाण्डीवधन्वानमवाप्तास्त्रमरिन्दमम् |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र गान्धारराजेन युद्धमासीन्महात्मनः |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
तत्र गुल्माः परित्रस्ताः सूर्ये चास्तमिते सति |
६२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र गोविन्दमासीनं प्रसन्नादित्यवर्चसम् |
१० क
विराट पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र गोष्ठीष्वथान्यासु सिद्धप्रव्रजितेषु च ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
तत्र ग्रामान्वहून्पश्यन्वह्वन्नरसभोजनान् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र घोरतमं वृत्तमृषीणां मे परिश्रुतम् ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तत्र च मय़ा चक्रं दृष्टं द्वादशारम् |
१६८ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तत्र च मय़ा दृष्टे स्त्रिय़ौ तन्त्रेऽधिरोप्य पटं वय़न्त्यौ |
१६७ क
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र चक्रुरनुज्ञाताः शरणान्युत शिल्पिनः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
तत्र चक्रैर्विमथितैर्भग्नैश्च परमाय़ुधैः |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र चक्षुर्दधे पार्थो यत्र विस्फार्यते धनुः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
२११
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र चङ्क्रम्यमाणौ तौ वासुदेवसुतां शुभाम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
तत्र चागत्य चण्डालो वैरन्त्यकृतकेतनः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
तत्र चाजाय़त तदा पुरुषः पुरुषर्षभ |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३०
श्रीभगवानु उवाच
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७७
भगवानु उवाच
तत्र चापि ध्रुवं पश्येच्छोषणं दैवकारितम् ||
३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र चापि मय़ा दृष्टा पृथिवी पृथिवीपते |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
तत्र चापि सभामध्ये पाण्डवानां च पश्यताम् |
७९ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र चाप्सरसः शुभ्रा नित्यकालमतन्द्रिताः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
तत्र चामिषलुव्धेन लुव्धकेन महावने |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
२८
सूत उवाच
तत्र चासीदमेय़ात्मा विद्युदग्निसमप्रभः |
३ क