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वन पर्व
अध्याय १४७
हनूमानु उवाच
ततोऽहं कार्यसिद्ध्यर्थं रामस्याक्लिष्टकर्मणः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
भीष्म उवाच
ततोऽहं कृपय़ाविष्टो विनिन्द्यात्मानमात्मना |
३६ क
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
ततोऽहं कौरवश्रेष्ठ श्रुत्वा सर्वमशेषतः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
ततोऽहं खण्डपरशुः स्मृतः परशुखण्डनात् ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८५
भीष्म उवाच
ततोऽहं जामदग्न्याय़ भृशं क्रोधसमन्वितः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
ततोऽहं ज्वलमानं वै पाय़सं प्रत्यवेदय़म् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
भीष्म उवाच
ततोऽहं तं नमस्कृत्य रथमारुह्य सत्वरः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
ततोऽहं तदनादृत्य पितुर्हस्तनिदर्शनम् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय ३२
शेष उवाच
ततोऽहं तप आतिष्ठे नैतान्पश्येय़मित्युत ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
ततोऽहं तप आस्थाय़ तोषय़ामास शङ्करम् |
८६ क
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
ततोऽहं तस्य तद्वाक्यं श्रुत्वा वज्रमुदीरय़म् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १०
सुरभिरु उवाच
ततोऽहं तस्य दुःखार्ता विरौमि भृशदुःखिता |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
ततोऽहं तानपि रणे शरैराशीविषोपमैः |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
ततोऽहं तान्नृपान्सर्वानाहूय़ समरे स्थितान् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८२
भीष्म उवाच
ततोऽहं तामिषुभिर्दीप्यमानैः; समाय़ान्तीमन्तकालार्कदीप्ताम् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १०
रुरुरु उवाच
ततोऽहं त्वां जिघांसामि जीवितेन विमोक्ष्यसे ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ११
मैत्रेय़ उवाच
ततोऽहं त्वामनुप्राप्तः कौरवाणामवेक्षय़ा |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३
शल्य उवाच
ततोऽहं त्वामुपस्थास्ये सत्यमेतद्व्रवीमि ते |
५ ख
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
ततोऽहं देवदेवाय़ रुद्राय़ प्रणतो रणे |
३८ क
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
ततोऽहं धनुरादाय़ तथाक्षय़्यौ महेषुधी |
२० क
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
ततोऽहं धनुरादाय़ तथाक्षय़्यौ महेषुधी |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८४
भीष्म उवाच
ततोऽहं निशि राजेन्द्र प्रणम्य शिरसा तदा |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८४
भीष्म उवाच
ततोऽहं निशि राजेन्द्र प्रसुप्तः शरविक्षतः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३८
रुद्र उवाच
ततोऽहं पर्वतं प्राप्तस्त्विमं त्वत्पादसेवितम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
ततोऽहं पर्वतचितः सहय़ः सहसारथिः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय २२१
जरितो उवाच
ततोऽहं पांसुना छिद्रमपिधास्यामि पुत्रकाः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
ततोऽहं पुनरेवाथ तानष्टौ व्रह्मवादिनः |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४५
भीष्म उवाच
ततोऽहं प्राञ्जलिर्भूत्वा मातरं सम्प्रसादय़म् |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय ३८
सूत उवाच
ततोऽहं प्रेषितस्तेन तव राजन्हितार्थिना ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय १९८
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽहं प्रेषय़िष्यामि धृतराष्ट्रस्य शीघ्रगान् |
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
ततोऽहं प्रय़तो भूत्वा प्रणिपत्य सुरर्षभान् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ प्रगृह्य रुचिरं धनुः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ प्रतिज्ञां परिपालय़न् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ मातरं वीरमातरम् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ वेगवन्तं महावलम् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ संन्यषीदं रथोत्तमे |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ समाश्वास्य पुरे जनम् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ सर्वसेनापतिस्तव |
२३ क
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
ततोऽहं मातलेर्वीर्यमपश्यं परमाद्भुतम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
ततोऽहं मोहमापन्नः प्रज्ञास्त्रं समय़ोजय़म् |
३७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७
व्यास उवाच
ततोऽहं याजय़िष्ये त्वां यदि यष्टुमिहेच्छसि ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
च्यवन उवाच
ततोऽहं रथमारुह्य त्वामवोचं नराधिप |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
ततोऽहं रथमारुह्य स्तूय़मानो द्विजातिभिः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
ततोऽहं राममासाद्य ववन्दे भृशविक्षतः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
ततोऽहं राममासाद्य वाणजालेन कौरव |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
ततोऽहं राममाय़ान्तं दृष्ट्वा समरकाङ्क्षिणम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय १४७
हनूमानु उवाच
ततोऽहं रुद्धवान्मार्गं तवेमं देवसेवितम् |
४० ख
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
ततोऽहं लघुभिश्चित्रैरस्त्रैस्तानसुरान्रणे |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
ततोऽहं लघुभिश्चित्रैर्व्रह्मास्त्रपरिमन्त्रितैः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
ततोऽहं लोकगुरुणा शमं नीतोऽर्थवेदिना |
१२ क