सौप्तिक पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
ततो विधनुषं देवा देवश्रेष्ठमुपागमन् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
४
नारद उवाच
ततो विधनुषः कांश्चित्कांश्चिदुद्यतकार्मुकान् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
ततो विधम्याधिरथेः शरजालानि पाण्डवः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२७१
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो विनद्य प्रहसञ्शालस्पर्शविवोधितः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
ततो विनशनं गच्छेत्सर्वपापप्रमोचनम् |
९६ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
ततो विनशनं गच्छेन्निय़तो निय़ताशनः |
११८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विनशनं राजन्नाजगाम हलाय़ुधः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
ततो विनिद्रा विश्रान्ताश्चन्द्रमस्युदिते पुनः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२२८
धृतराष्ट्र उवाच
ततो विनिर्दहेय़ुस्ते तपसा हि समन्विताः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
सञ्जय़ उवाच
ततो विनिर्भ्राम्य पुनः पार्थमास्फोट्य चासकृत् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२७१
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो विनिर्याय़ पुरात्कुम्भकर्णः सहानुगः |
१ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विनेदुः सहसा स्त्रीपुंसास्तत्र सर्वशः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विपाप्मा द्रविडेषु राज; न्समुद्रमासाद्य च लोकपुण्यम् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४२
भीष्म उवाच
ततो विपुलमानाय़्य देवशर्मा महातपाः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
२५
कश्यप उवाच
ततो विभक्ता अन्योन्यं नाद्रिय़न्तेऽर्थमोहिताः ||
१२ ग
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विभज्यमानेषु वलेषु वलिनां वरः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो विभीषणः पार्थ राममिक्ष्वाकुनन्दनम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
ततो विमनसः सर्वे त्रस्ताः क्षुद्रमृगा इव |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
ततो विमनसो राजंस्तावकाः पुरुषर्षभाः |
६३ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विममृशे राजा किं न्विदं दैवकारितम् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४
नारद उवाच
ततो विमर्दः सुमहान्राज्ञामासीद्युधिष्ठिर |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
ततो विमर्दः सुमहान्वभूव; तस्यार्जुनस्याधिरथेश्च राजन् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विमल आदित्ये व्राह्मणेभ्यो जनार्दनः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
ततो विमुच्य देवेन्द्रं व्रह्महत्या युधिष्ठिर |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विरहितं दृष्ट्वा पितरं प्रतिपूज्य सः |
११ क
विराट पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विराटं प्रथमं युधिष्ठिरो; राजा सभाय़ामुपविष्टमाव्रजत् |
१ क
विराट पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विराटं समुपेत्य पाण्डवः; सुदीनरूपो वचनं महामनाः |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विराटः कौन्तेय़ानतिमानुषविक्रमान् |
३६ क
विराट पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विराटः परमाभितुष्टः; समेत्य राज्ञा समय़ं चकार |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विराटः प्रस्कन्द्य रथादथ सुशर्मणः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
ततो विराटद्रुपदौ केकय़ाः सात्यकिः शिविः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
ततो विराटद्रुपदौ द्रोणं प्रतिय़यू रणे |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
ततो विराटद्रुपदौ धृष्टकेतुर्युधिष्ठिरः |
७७ क
विराट पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विराटमूचुस्ते कीचकोऽस्याः कृते हतः |
७ क
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विराटस्य सुतः सव्यमावृत्य वाजिनः |
२७ क
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विराटो नृपतिः सम्प्रहृष्टतनूरुहः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो विलीनगर्भा सा मानुषी भुवि दृश्यते ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
ततो विलोक्य तेजस्वी व्राह्मणो मामुवाच ह |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७
अगस्त्य उवाच
ततो विवदमानः स मुनिभिः सह वासव |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विवाहे निर्वृत्ते स राजा शन्तनुर्नृपः |
१ क
विराट पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विवाहो विधिवद्ववृते मत्स्यपार्थय़ोः ||
२५ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विविक्त एकान्ते तस्थौ वुद्धिमतां वरः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
ततो विवुद्धे तस्मिंस्तु सर्वलोकपितामहे |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
ततो विवुधशार्दूलास्तं रथं समकल्पय़न् ||
६७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो विवेश भुवनं गान्धार्या सहितो नृपः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
ततो विव्याध राधेय़ं शतेन नतपर्वणाम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
ततो विशालामासाद्य नदीं त्रैलोक्यविश्रुताम् |
१०० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
ततो विश्रमिता चैव स्वप्ता च विगतज्वरः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
ततो विश्रान्तमासीनं गोत्रप्रश्नमपृच्छत |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
ततो विश्वेश्वरं योनिं विश्वस्य जगतः पतिम् ||
५५ ख