आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
व्राह्मण उवाच
जिह्वा चक्षुस्तथा श्रोत्रं त्वङ्मनो वुद्धिरेव च |
६ क
सभा पर्व
अध्याय
५७
दुर्योधन उवाच
जिह्वा मनस्ते हृदय़ं निर्व्यनक्ति; ज्याय़ो निराह मनसः प्रातिकूल्यम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४७
भीष्म उवाच
जिह्वा विष्यन्दिनी चैव भौमाप्यास्रवणं तथा ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
जिह्वां चावर्तय़ामास तस्यापि हुतभुक्तदा ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
जिह्वां दत्त्वा वहूनां हि क्षुद्राणां लुव्धचेतसाम् |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
जिह्वाग्रेषु प्रवर्तन्ते यत्नसाध्या विनाशिनः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
जिह्वाभिर्ये विष्वग्वक्त्रं; लेलिह्यन्ते सूर्यप्रख्यम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
जिह्वामध्यात्ममित्याहुर्यथातत्त्वनिदर्शनम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
नारद उवाच
जिह्वामुद्धर सर्वेषां परिमृज्यानुमृज्य च ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
च्यवन उवाच
जिह्वामूले स्थितास्तस्य सर्वे देवाः सवासवाः |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
जिह्वास्थश्च तथा सोमो रसज्ञाने विधीय़ते ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
जिह्वय़ा यानि पुरुषस्त्वचा वाप्युपसेवते |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०७
गुरुरु उवाच
जिह्वय़ा रसनं यच्च तदेव परिवर्जितम् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
जीमूत इव घर्मान्ते महावातसमीरितः |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
जीमूत इव घर्मान्ते सर्वां संश्रावय़न्सभाम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
जीमूतस्यात्र विप्रर्षेरुपतस्थे महात्मनः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
जीमूतस्येव घर्मान्ते द्रक्ष्यन्ति युधि सैनिकाः ||
५७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
जीमूतस्येव नदतः शक्राशनिसमस्वनम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
जीमूता इव घर्मान्ते शरवर्षैरवाकिरन् ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
जीमूतानां यथा वृष्टिस्तपान्ते भरतर्षभ ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
जीमूताविव घर्मान्ते गर्जमानौ नभस्तले ||
६० ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
जीमूताविव घर्मान्ते विनदन्तौ महावलौ ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
जीमूताविव चान्योन्यं तौ ववर्षतुराहवे |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
जीमूतैश्च दिशः सर्वाश्चक्रे तिमिरदुर्दिनाः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१०३
लोमश उवाच
जीर्णं तद्धि मय़ा तोय़मुपाय़ोऽन्यः प्रचिन्त्यताम् |
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
जीर्णं सिंहमिव प्रांशुं नरसिंहं पितामहम् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
७९
अनुरु उवाच
जीर्णः शिशुवदादत्तेऽकालेऽन्नमशुचिर्यथा |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
जीर्णमन्नं प्रशंसन्ति भार्यां च गतय़ौवनाम् |
५९ क
आदि पर्व
अध्याय
९२
स्त्र्यु उवाच
जीर्णस्तु मम वासोऽय़ं यथा स समय़ः कृतः ||
४८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
पितो उवाच
जीर्णेन वय़सा पुत्र न मा क्षुद्वाधतेऽपि च |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
जीर्यते म्रिय़ते चैव चतुर्भिर्लक्षणैर्युतम् ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
जीवं जीवकसङ्घाश्चाप्यनुगच्छन्ति पाण्डवान् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
जीवं तस्मै कुमाराय़ प्रादाद्वर्षशताय़ वै ||
१०९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
जीवं पश्यामि वृक्षाणामचैतन्यं न विद्यते ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
जीवः काय़ं वहति चेच्चेष्टय़ानः कलेवरम् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८०
भरद्वाज उवाच
जीवः किंलक्षणस्तत्रेत्येतदाचक्ष्व मेऽनघ ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
युधिष्ठिर उवाच
जीवः स भगवन्क्वस्थः सुखदुःखे समश्नुते ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२००
मार्कण्डेय़ उवाच
जीवः सङ्क्रमतेऽन्यत्र कर्मवन्धनिवन्धनः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
जीवग्राहं जिघृक्षन्तं सौभद्रेण यशस्विना ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
जीवग्राहं निगृह्णाति तस्य लोका यथा मम ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
जीवग्राहं निगृह्णीमो वय़मेनं नराधिपाः ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
जीवग्राहमगृह्णान्मां मूर्छितं पतितं भुवि ||
५१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
जीवतः पितुरैश्वर्यं हृत्वा मन्युवशं गतः ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
जीवतश्च तथैवान्यः शस्त्रं काय़े न्यमज्जय़त् ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय
२८५
सूर्य उवाच
जीवतां कुरुते कार्यं पिता माता सुतास्तथा |
४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
जीवतां परिमाणज्ञः सैन्यानामसि पाण्डव |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
जीवति त्वय़ि दुर्धर्ष किं करिष्याम्यहं त्वय़ा ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
जीवतो धृतराष्ट्रस्य दौरात्म्याद्भ्रंशय़िष्यसि ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२
शल्य उवाच
जीवतो भर्तुरिन्द्रेण स वः किं न निवारितः ||
६ ख