सभा पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ||
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ||
२८ ख
सभा पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
जितवान्घोरसङ्काशान्क्रीडन्निव जनार्दनः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
जितवान्पुण्डरीकाक्षो यवनांश्च सहानुगान् ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
जितवान्मां महावाहो यतमानं महारणे ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
जितवान्योऽस्त्रवीर्येण दिष्ट्या पार्थः स जीवति ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
जितवान्समरे पार्थः पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
जितशिश्नोदरो मैत्रः शिष्टाचारसमाहितः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
जितस्य तु हृषीकेश वध एव कुतो जय़ः ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
धर्म उवाच
जिता लोकास्त्वय़ा सर्वे ये दिव्या ये च मानुषाः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
जिता सभा वस्त्रवता समाशा गोमता जिता |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१००
भीष्म उवाच
जितां च भूमिं रक्षेत भग्नान्नात्यनुसारय़ेत् ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
६२
द्रौपद्यु उवाच
जितां वाप्यजितां वापि मन्यध्वं वा यथा नृपाः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
जिताः शकुनिना राज्यं तत्र किं मम दुष्कृतम् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
जिताः सङ्ख्ये महाराज युय़ुधानेन दंशिताः ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
जितात्मा पाण्डवोऽमर्षी भ्रातुस्तिष्ठति शासने ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
जितात्मा मुनिवीर्यश्च दीप्तलोमा भय़ङ्करः ||
३५ ख
विराट पर्व
अध्याय
३९
उत्तर उवाच
जितानक्षैस्तदा कृष्णा तानेवान्वगमद्वनम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
जितानामजितानां च क्षत्रधर्मादपैति सः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
जितानामजितानां च क्षत्रधर्मादपैति सः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
धृतराष्ट्र उवाच
जितानित्येव मन्वानः पाण्डवानवमन्यते ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
जितान्पाण्डुसुतान्मत्वा रूपं धारय़ते महत् ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
४३
दुर्योधन उवाच
जितामस्त्रप्रतापेन श्वेताश्वस्य महात्मनः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२००
वैशम्पाय़न उवाच
जितारय़ो महाप्राज्ञाः सत्यधर्मपराय़णाः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
जितासनौ तथाधाय़ मूर्धन्यात्मानमेव च ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
जितास्ते कर्मभिर्लोकाः प्राप्तोऽसि परमां गतिम् ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
जितास्तेन वय़ं सर्वे व्यपय़ाम रणात्ततः ||
४८ ग
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
जिते हि धर्मस्य सुते सभार्ये; सभ्रातृके सानुचरे निरस्ते |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
जितेन पूर्वं चानेन पाण्डवेन कृतः पणः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
जितेन्द्रिय़ं विशुद्धं च स्थितं कर्मण्यथाद्भुते ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
जितेन्द्रिय़ं स्थितं स्थित्यां मित्रमत्यागि चेष्यते ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
जितेन्द्रिय़त्वाद्वशिनः शुक्लत्वान्मन्दरोगिणः |
३० क
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
जितेन्द्रिय़ममित्राणामपि दृष्टिमनोहरम् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३३
युधिष्ठिर उवाच
जितेन्द्रिय़श्च वसुधां प्राप्स्यसीति च माव्रवीत् |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
४५
सूत उवाच
जितेन्द्रिय़श्चात्मवांश्च मेधावी वृद्धसेवितः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
जितेन्द्रिय़स्य दान्तस्य स्वर्गमार्गप्रदेशकम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
जितेन्द्रिय़ा भूतहिते निविष्टा; स्तेषामसौ नाय़मरिघ्न लोकः ||
३६ ख