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द्रोण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
जानामि त्वां महाभाग पाण्डवानां हिते रतम् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
जानामि त्वां महावाहो क्षत्रधर्मे व्यवस्थितम् |
५२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
जानामि त्वां महावाहो क्षत्रिय़ाणां क्षय़ङ्करम् |
४३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
जानामि त्वां युधि श्रेष्ठमत्यन्तं पूर्ववैरिणम् |
४७ क
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
जानामि त्वाधिक्षिपन्तं जोषमास्स्वोत्तरं शृणु ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
जानामि त्वामहं वाय़ो सर्वप्राणभृतां वरम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय १८३
गौतम उवाच
जानामि नाहं मुह्यामि त्वं विवक्षुर्विमुह्यसे |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११९
व्यास उवाच
जानामि पापैः स्वकृतैर्गतं त्वां कीट कीटताम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय १९०
वामदेव उवाच
जानामि पुत्रं दशवर्षं तवाहं; जातं महिष्यां श्येनजितं नरेन्द्र |
७३ क
वन पर्व
अध्याय २८७
वैशम्पाय़न उवाच
जानामि प्रणिधानं ते वाल्यात्प्रभृति नन्दिनि |
१९ क
वन पर्व
अध्याय १२०
सात्यकिरु उवाच
जानामि वीर्यं च तवात्मजस्य; कार्ष्णिर्भवत्येष यथा रणस्थः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय ३२
व्रह्मो उवाच
जानामि शेष सर्वेषां भ्रातृणां ते विचेष्टितम् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
जानामि समरे वीर्यं शत्रुभिर्दुःसहं तव |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ७३
देवय़ान्यु उवाच
जानामि हि त्वां संशान्तं वीर्यवन्तं यशस्विनम् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
जानाम्यध्यात्मय़ोगांश्च योऽहं यस्माच्च भारत |
३४ क
सभा पर्व
अध्याय ५२
विदुर उवाच
जानाम्यहं द्यूतमनर्थमूलं; कृतश्च यत्नोऽस्य मय़ा निवारणे |
११ क
आदि पर्व
अध्याय २०६
उलूप्यु उवाच
जानाम्यहं पाण्डवेय़ यथा चरसि मेदिनीम् |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
कर्ण उवाच
जानाम्यहं महाप्राज्ञ सर्वमेतन्न संशय़ः |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
जानाम्यहमिदं युद्धं त्वय़ा मद्वचनात्कृतम् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय ३८
शमीक उवाच
जानाम्युग्रप्रभावं त्वां पुत्र सत्यगिरं तथा |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
जानाम्येतत्त्वादृशो नास्ति योद्धा; राज्यं च ते जानमानो हरामि ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
जानाम्येतदहं सर्वं यदर्थं त्वमिहागतः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
भगवानु उवाच
जानाम्येतां महाराज धार्तराष्ट्रस्य पापताम् |
८५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १
लुव्धक उवाच
जानाम्येवं नेह गुणागुणज्ञाः; सर्वे निय़ुक्ता गुरवो वै भवन्ति |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १९
सूत उवाच
जानार्दने न मे मोहो नापि मे भय़माविशत् |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
जानासि च महावाहो धर्मराजस्य या त्वय़ि |
५१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९८
नारद उवाच
जानासि च यथा शक्रो नैताञ्शक्नोति वाधितुम् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ९७
वैशम्पाय़न उवाच
जानासि च यथावृत्तं शुल्कहेतोस्त्वदन्तरे |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
जानासि त्वं क्लेशमस्मासु वृत्तं; त्वां पूजय़न्सञ्जय़ाहं क्षमेय़म् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय २३७
दुर्योधन उवाच
जानासि त्वं जिताञ्शत्रून्गन्धर्वांस्तेजसा मय़ा ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
जानासि त्वं सञ्जय़ सर्वमेत; द्द्यूतेऽवाच्यं वाक्यमेवं यथोक्तम् |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
अर्जुन उवाच
जानासि दाशार्ह मम व्रतं त्वं; यो मां व्रूय़ात्कश्चन मानुषेषु |
६१ क
आदि पर्व
अध्याय ४४
सूत उवाच
जानासि भद्रे यत्कार्यं प्रदाने कारणं च यत् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
जानासि मे जीवपुत्रे भावं नित्यमनुग्रहे |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७७
भगवानु उवाच
जानासि हि महावाहो त्वमप्यस्य परं मतम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २२७
वैशम्पाय़न उवाच
जानासि हि यथा क्षत्ता द्यूतकाल उपस्थिते |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७६
अर्जुन उवाच
जानासि हि यथा तेन द्रौपदी पापवुद्धिना |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७९
सात्यकिरु उवाच
जानासि हि यथा दृष्ट्वा चीराजिनधरान्वने |
६ क
वन पर्व
अध्याय २८६
कर्ण उवाच
जानीत इति वै कृत्वा भगवानाह मद्धितम् ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
जानीतामद्य ज्येष्ठस्य पाण्डवस्य पराक्रमम् |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
जानीते हि भवान्कर्णं वीर्यवन्तं पराक्रमे ||
८२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२
शल्य उवाच
जानीमः शरणं प्राप्तमिन्द्राणीं तव वेश्मनि |
११ क
सभा पर्व
अध्याय ५७
दुर्योधन उवाच
जानीमस्त्वां विदुर यत्प्रिय़स्त्वं; वालानिवास्मानवमन्यसे त्वम् ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय ५६
विदुर उवाच
जानीमहे देवितं सौवलस्य; वेद द्यूते निकृतिं पार्वतीय़ः |
१० क
वन पर्व
अध्याय ५७
वृहदश्व उवाच
जानीषे त्वं यथा राजा सम्यग्वृत्तः सदा त्वय़ि |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
जानीषे मम वीर्यं त्वं तव चाहमरिन्दम |
६८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
जानीषे मां गुरुं भीष्म न चेमां प्रतिगृह्णसे |
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
जानीषे हि रणे द्रोणं रभसं श्रेष्ठसंमतम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४७
शौनक उवाच
जानीहि मे कृतं तात व्राह्मणान्प्रति भारत ||
२० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
कृप उवाच
जानीय़ादागमान्सर्वान्ग्राह्यं च न विरोधय़ेत् ||
३ ख