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विराट पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
जवेन सर्वेण कुरु प्रय़त्न; मासादय़ैतद्रथसिंहवृन्दम् ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
जवेनापततः पार्थानेकः सर्वानवारय़त् ||
७९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
जवेनापततां तेषां भीष्मः शान्तनवो रणे |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
जवेनाभ्यद्रवञ्शूराः पञ्च पाण्डवतो रथाः ||
५५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
जवेनाभ्यद्रवद्राजन्धनञ्जय़रथं प्रति ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
जवेनाभ्यद्रवन्द्रोणं महता निस्वनेन च |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
जवेनाभ्यद्रवन्पार्थं कुपिताः सैनिकास्तव ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय २६
सूत उवाच
जवेनाभ्यपतत्तार्क्ष्यः सशाखागजकच्छपः ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
जवेनाभ्यपतत्तूर्णं सर्वांश्चैको न्यवारय़त् ||
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
जवेनाभ्यपतद्धीमान्हार्दिक्यः शिनिपुङ्गवम् ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
जवेनाभ्यपतद्भीमः किरञ्शरशतान्वहून् ||
७० ख
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
जवेनाभ्यपतद्भीमः प्रगृह्य महतीं गदाम् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
जवेनाभ्यपतद्भीमः प्रगृह्य महतीं गदाम् ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
जवेनाभ्यपतन्हृष्टा यतो वै तावकं वलम् ||
६५ ख
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
जवेनाभ्यपतन्हृष्टाः पाण्डवानामनीकिनीम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
जहतस्तात धर्मार्थौ प्रेतं दुःखसुखे यथा ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
जहर्ष कर्णोऽतिभृशं सह दुःशासनादिभिः |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय २१४
वैशम्पाय़न उवाच
जहसुश्चापरा नार्यः पपुश्चान्या वरासवम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
जहाति दारानिहते न सम्पदः; सदश्वय़ानं विविधाश्च याः क्रिय़ाः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५६
भीष्म उवाच
जहाति पापं श्रद्धावान्सर्पो जीर्णामिव त्वचम् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
जहाति मृत्युं च जरां भय़ं च; न क्षुत्पिपासे मनसश्चाप्रिय़ाणि |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
जहार च स विप्राणां रत्नान्युत्क्रोशतामपि ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
जहार तद्गोधनमाजिमध्ये; वस्त्राणि चादत्त महारथेभ्यः ||
४६ ख
आदि पर्व
अध्याय १७
सूत उवाच
जहार दानवेन्द्रेभ्यो नरेण सहितः प्रभुः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
जहार धर्मराजानं यमौ कृष्णां च राक्षसः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
जहार नृपतेः काय़ाच्छिरो ज्वलितकुण्डलम् ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
जहार भद्रां वैशालीं मातुलस्य नृशंसकृत् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
जहार रथशार्दूलः प्रहसञ्शिनिपुङ्गवः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय ११६
अकृतव्रण उवाच
जहार वत्सं क्रोशन्त्या वभञ्ज च महाद्रुमान् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
जहार सद्यो भल्लेन विपाटस्य शिरो रथात् ||
५९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
जहार समरे प्राणान्नानाशस्त्रैरनेकधा ||
६६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
जहार समरे प्राणान्भीमो भीमपराक्रमः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय २०३
नारद उवाच
जहार सर्वभूतानां चक्षूंषि च मनांसि च ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
जहार सशिरस्त्राणं शिरस्तस्य महात्मनः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
जहार सारथेः काय़ाच्छिरः संनतपर्वणा ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २७३
मार्कण्डेय़ उवाच
जहार सुनसं चारु शिरो भ्राजिष्णुकुण्डलम् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
जहाराथ ततो जिष्णुः किरातमुरसा वली |
४७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
जहास सस्वनं हासं धृतवर्मा महाहवे ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७५
वैशम्पाय़न उवाच
जहास सस्वनं हासं वाक्यं चेदमथाव्रवीत् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९४
सञ्जय़ उवाच
जहास सस्वनं हासं वाक्यं चेदमुवाच ह ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
जहास स्वनवद्धासं प्रहस्येदमुवाच ह ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
जहि कर्णं महेष्वासं निशीथे माय़या रणे |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
जहि कर्णं रणे शूरं सात्वतेन सहाय़वान् |
५६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
जहि कृष्णौ महावाहो धर्मराजं च मातुल |
६२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२
देवा ऊचुः
जहि क्रोधमिमं वीर प्रीतो भव सुरेश्वर ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२
शल्य उवाच
जहि क्रोधमिमं साधो न क्रुध्यन्ति भवद्विधाः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
जहि क्षिप्रं महावाहो पश्चात्कर्णं वधिष्यसि ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
जहि चैनं महावाहो वासवो नमुचिं यथा ||
३४ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
जहि तं पापकर्माणं शम्वरं मघवानिव |
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
जहि तूवरकं क्षिप्रं कर्णस्य वलमादधत् ||
३५ ख