chevron_left  जलसन्धोarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
जलसन्धो महातेजा राजन्रथवरस्तव |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
जलसन्धोऽथार्श्यशृङ्गी राक्षसश्चाप्यलाय़ुधः |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
जलस्थं तं महाराज तव पुत्रं महावलम् |
१५ ख
वन पर्व
अध्याय १०७
लोमश उवाच
जलस्थानेषु रम्येषु पद्मिनीभिश्च सङ्कुलम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय २१७
वैशम्पाय़न उवाच
जलस्थानेषु सर्वेषु क्वाथ्यमानेषु भारत |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ११६
वैशम्पाय़न उवाच
जलस्थानैश्च विविधैः पद्मिनीभिश्च शोभितम् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
जलस्य धारा जनिता शीतस्यामृतगन्धिनः |
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
जलस्य धारां विहितां दृष्ट्वा तां पाण्डवेन ह |
५० क
वन पर्व
अध्याय १३७
लोमश उवाच
जलहीनं सरो दृष्ट्वा यवक्रीस्त्वरितः पुनः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १३०
लोमश उवाच
जलां चोपजलां चैव यमुनामभितो नदीम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९५
मनुरु उवाच
जलात्प्रसूता जगती जगत्यां जाय़ते जगत् ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
जलार्थं च गताः केचिन्निष्प्राणा वहवोऽर्जुन |
५४ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
जलार्द्रपक्षा विहगाः समुत्पेतुः सहस्रशः ||
५१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८४
धृतराष्ट्र उवाच
जलावसिक्तो विरजाः पन्थास्तस्येति चान्वशात् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९५
मनुरु उवाच
जलाश्रय़ः स्वेद उक्तो रसश्च; वाय़्वात्मकः स्पर्शकृतो गुणश्च ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
जलाशय़ं प्रविष्टोऽद्य वाञ्छञ्जीवितमात्मनः |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
जलाहारो वाय़ुभक्षः पर्णाहारश्च सोऽभवत् |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
जले निपतितं दृष्ट्वा किङ्करा जहसुर्भृशम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
जले निलिल्यिरे काश्चित्काश्चिद्गुल्मान्प्रपेदिरे |
२९ क
वन पर्व
अध्याय २
शौनक उवाच
जले भुवि तथाकाशे जाय़मानः पुनः पुनः ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
जले भुवि तथाकाशे नान्यत्रेति विनिश्चय़ः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
जलेचरः काञ्चनय़ष्टिसंस्थो; व्यात्ताननः सर्वतिमिप्रमाथी |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
व्रह्मो उवाच
जलेचरः क्लान्तमनास्तेजसाग्नेः प्रदीपितः |
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
भीष्म उवाच
जलेचरेषु सत्त्वेषु शीतरश्मिरिव प्रभुः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
सञ्जय़ उवाच
जलेन क्लेदय़न्त्यन्ये विमुच्य कवचान्यपि ||
१७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
जलेन सुखशीतेन तालवृन्तैश्च भारत ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
जलेनात्यर्थशीतेन वीजन्तः पुण्यगन्धिना ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३९
वाय़ुरु उवाच
जलेश्वरस्तु हृत्वा तामनय़त्स्वपुरं प्रति |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
जलोदरसमाय़ुक्ताः श्वित्रिणः पलितास्तथा |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
जलोदरेऽर्शसां रोगे ज्वरगण्डविषूचिके |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
भीष्म उवाच
जलौकसां स सत्त्वानां वभूव प्रिय़दर्शनः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
जलौकावत्पिवेद्राष्ट्रं मृदुनैव नराधिप |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
जल्पनाभ्यवहारार्थं मुखमिन्द्रिय़मुच्यते |
२० क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
जवं परममास्थाय़ प्रदुद्राव विहङ्गमः ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
जवमुत्तममास्थाय़ सर्वतः प्राद्रवन्भय़ात् ||
४४ ख
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
जवसत्त्वोपपन्नानां वय़ःस्थानां नराधिप |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
जवे प्रहारे संमर्दे सर्व एवातिमानुषाः |
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
जवे लक्ष्यस्य हरणे भोज्ये पांसुविकर्षणे |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
जवे लक्ष्याभिहरणे भोज्ये पांसुविकर्षणे |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
जवे वले च सदृशमरुणानुजवातय़ोः |
१० क
वन पर्व
अध्याय १४२
युधिष्ठिर उवाच
जवे वाय़ुर्मुखे सोमः क्रोधे मृत्युः सनातनः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
जवे श्येनसमाश्चित्राः सुदामानमुदावहन् ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय १३७
वैशम्पाय़न उवाच
जवेन प्रय़यू राजन्दक्षिणां दिशमाश्रिताः ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
जवेन महता प्राय़ाद्गौतमस्याश्रमं प्रति ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
जवेन महता वीराः परिवार्योपतस्थिरे ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
जवेन वाजिनोऽत्येति वलेनात्येति कुञ्जरान् |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
जवेन शूरोऽभिससार सर्वां; स्तथार्जुनस्यात्र सुतोऽभिमन्युः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२९
भीष्म उवाच
जवेन सन्धिं कुर्वीत पूर्वान्पूर्वान्विमोक्षय़न् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
जवेन समभिद्रुत्य जगाम धरणीतलम् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
जवेन सम्प्राप्त इहामरद्युते; तवान्तिकं प्रापय़ितुं वचो महत् ||
१५ ख