शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
जनवादोऽमृषावादः स्तुतिनिन्दाविवर्जनम् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
जनश्च विमनाः सर्वो भय़त्राससमन्वितः |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय
११
नकुल उवाच
जनस्तु मामाह स चापि पाण्डवो; युधिष्ठिरो ग्रन्थिकमेव नामतः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
जनस्तूच्चारितं धर्मं विजानात्यन्यथान्यथा ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
जनस्थाने शिरश्छिन्नं राक्षसस्य दुरात्मनः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
जनस्य संनिनादं तु श्रुत्वा दुर्योधनोऽव्रवीत् |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
७६
वृहदश्व उवाच
जनस्य सम्प्रहृष्टस्य नलं दृष्ट्वा तथागतम् ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
जनाः समववुध्येरन्भीमोऽय़मिति भारत ||
१८ ग
विराट पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
जनाकीर्णेषु देशेषु खर्वटेषु पुरेषु च ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
जनान्योऽभिभवत्यन्यान्कर्मणा हि स वै पुमान् ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
जनार्दनं च मेधावी व्यसर्जय़त वै गृहान् ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
जनार्दनं चापि समेत्य तात; महामात्रं वीर्यवतामुदारम् |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
जनार्दनं त्रिभिर्वाणैरभ्यहन्दक्षिणे भुजे |
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
जनार्दनं द्वादशभिः पराभिन; न्नवैर्नवत्या च शरैस्तथार्जुनम् |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
जनार्दनं भीमसेनार्जुनौ च; माद्रीसुतौ सात्यकिं चेकितानम् |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
जनार्दनं सात्यकिं च प्रेम्णा स परिषस्वजे |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
जनार्दनवचः श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
जनार्दनश्चाप्यपरोक्षविद्यो; न संशय़ं पश्यति वृष्णिसिंहः ||
९४ ख
वन पर्व
अध्याय
२५२
द्रौपद्यु उवाच
जनार्दनस्यानुगा वृष्णिवीरा; महेष्वासाः केकय़ाश्चापि सर्वे |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
जनार्दनेनानुगतो विदुरेण च धीमता |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
जनार्दनो दारुकमाह सत्वरः; प्रचोदय़ाश्वानिति सात्यकिस्तदा ||
५५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
जनार्दनो दीनमनाः प्रत्यभाषत फल्गुनम् ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
जनाश्च तद्ददृशिरे रक्षः कौतूहलान्विताः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२४३
वैशम्पाय़न उवाच
जनाश्चापि महेष्वासं तुष्टुवू राजसत्तमम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
६५
वृहदश्व उवाच
जनित्र्यै प्रेषय़ामास सैरन्ध्री रुदते भृशम् |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
जनिष्यति महातेजाः पुत्रस्तव यशस्विनि |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
जनिष्यते हि ते पुत्रः क्रूरकर्मा महावलः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
जनिष्यते हि ते भ्राता व्रह्मभूतस्तपोधनः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
जनौघसलिलावर्तो रथनागाश्वमीनवान् |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
जन्तवः परिवर्तन्ते मरणादुद्विजन्ति च ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
जन्तुः पश्यति ज्ञानेन ततः सत्त्वं प्रकाशते ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
१२८
लोमश उवाच
जन्तुर्ज्येष्ठः समभवज्जनित्र्यामेव भारत |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१२७
लोमश उवाच
जन्तुर्नाम सुतस्तस्मिन्स्त्रीशते समजाय़त ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
जन्तुष्वेकतमेष्वेवं भावा ये विधिमास्थिताः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२००
व्याध उवाच
जन्तुस्तु कर्मभिस्तैस्तैः स्वकृतैः प्रेत्य दुःखितः |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
जन्तूपाख्यानमत्रैव यत्र पुत्रेण सोमकः |
११९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
जन्तोः पञ्चेन्द्रिय़स्यास्य यदेकं छिद्रमिन्द्रिय़म् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७९
भरद्वाज उवाच
जन्तोः प्रमीय़माणस्य जीवो नैवोपलभ्यते |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
जन्तोः प्रेतस्य कौन्तेय़ गतिः स्वैरिह कर्मभिः |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
देवमत उवाच
जन्तोः सञ्जाय़मानस्य किं नु पूर्वं प्रवर्तते |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
जन्तोर्विशुद्धपापस्य भवे भक्तिः प्रजाय़ते |
१५८ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
जनमेजय़ उवाच
जन्म कर्म च भूतानामेतेषामनुपूर्वशः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
जन्म चाग्र्यं महीपाल यन्मां त्वं परिपृच्छसि ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
१२६
युधिष्ठिर उवाच
जन्म चाप्रतिवीर्यस्य कुशलो ह्यसि भाषितुम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
जन्म चोक्तं वसिष्ठेन व्रह्मणो वचनं महत् ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
जन्म द्वितीय़मित्येतज्जघन्यतरमुच्यते ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
जनमेजय़ उवाच
जन्म धर्मगृहे चैव नरनाराय़णात्मकम् |
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
जन्म रामस्य च मुनेर्विश्वामित्रस्य चैव ह ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
जन्मकर्मतपोय़ोगास्तय़ोस्तव च पुष्कलाः |
८६ क