कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
चतुर्दशसहस्रैश्च तुरगाणां महाहवे ||
९३ ख
मौसल पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्दशी पञ्चदशी कृतेय़ं राहुणा पुनः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
चतुर्दशीं पञ्चदशीं भूतपूर्वां च षोडशीम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
११५
अकृतव्रण उवाच
चतुर्दशीमष्टमीं च रामं पश्यन्ति तापसाः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
चतुर्दशे तु दिवसे यः पूर्णे प्राशते हविः |
६० क
सभा पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्दश्यां निशाय़ां तु निवृत्तो मागधः क्लमात् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
चतुर्दिशं विचित्राश्च शतघ्न्योऽथ हुताशदाः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
चतुर्द्वारं पुरुषं चतुर्मुखं; चतुर्धा चैनमुपय़ाति निन्दा |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
चतुर्धा जन्म इत्येतद्भूतग्रामस्य लक्ष्यते ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्धा पृथिवीं कृत्वा चातुर्होत्रप्रमाणतः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
चतुर्धा वहिनीं कृत्वा त्वरिता द्रोणमभ्ययुः ||
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्भागं भुवः कृत्स्नं स भुङ्क्ते मनुजेश्वरः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११७
नारद उवाच
चतुर्भागावशिष्टं तदाचख्यौ कार्यमस्य हि ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११४
नारद उवाच
चतुर्भागेन शुल्कस्य जनय़स्वैकमात्मजम् ||
१५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
चतुर्भिः पाण्डुपुत्रैश्च भीमार्जुनय़मैर्नृप |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
चतुर्भिः सहितः पुत्रैर्भानोरेवान्वय़स्तु सः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
चतुर्भिः सारथिं चास्य चतुर्भिश्चतुरो हय़ान् ||
६४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
चतुर्भिः सारथिं ह्यार्च्छद्भीमं पञ्चभिरेव च ||
५४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
चतुर्भिः सिन्धुराजश्च वृषसेनश्च सप्तभिः |
७९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
चतुर्भिरथ नाराचैरावन्त्यस्य महात्मनः |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
चतुर्भिरश्वांश्चतुरः कपिं तथा; शरैः स नाराचवरैरवाकिरत् ||
५८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
चतुर्भिरश्वाञ्जवनाननय़द्यमसादनम् ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
चतुर्भिर्निजघानाश्वान्कल्याणान्कृतवर्मणः ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
चतुर्भिर्निजघानाश्वान्पत्रिभिः कृतवर्मणः |
८२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
चतुर्भिर्निशितैस्तीक्ष्णैर्हय़ाञ्जघ्ने शरोत्तमैः ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
चतुर्भिर्लक्षणैर्हीनं तथा षड्भिः सषोडशैः |
१२४ क
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्भिश्चतुरस्तीक्ष्णैरविध्यत्परमेषुभिः ||
८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्भिश्चतुरात्मानं सत्त्वस्थं सात्वतां पतिम् |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
चतुर्भिश्चतुरो वाहांस्तस्य हत्वा महारथः |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
चतुर्भिश्चतुरो वाहाननय़द्यमसादनम् ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
चतुर्भिश्चतुरो वाहान्विव्याध सुवलात्मजः ||
५५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
चतुर्भिश्चतुरोऽस्याश्वानाजघानाशु वीर्यवान् ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
चतुर्भिस्तु शरैस्तूर्णं चतुरस्तुरगोत्तमान् |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
चतुर्भिस्तोमरैः कर्णं ताडय़ित्वा मुदानदत् ||
३३ ख
मौसल पर्व
अध्याय
९
अर्जुन उवाच
चतुर्भुजः पीतवासा श्यामः पद्माय़तेक्षणः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
चतुर्मुखश्च संवृत्तो दर्शय़न्योगमात्मनः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
चतुर्मुखो महालिङ्गश्चारुलिङ्गस्तथैव च |
७४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
चतुर्मूर्तिरहं शश्वल्लोकत्राणार्थमुद्यतः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
चतुर्मूर्तिश्चतुर्वाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः |
९५ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
चतुर्युः स महाराज भोज इन्द्रसखो वली |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
८४
धृतराष्ट्र उवाच
चतुर्युक्तान्रथांस्तस्मै रौक्मान्दास्यामि षोडश ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्युजामुपेतानां सूतैः कुशलसंमतैः |
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्युजो रथाः सर्वे सर्वे शस्त्रसमाय़ुताः |
१० क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
चतुर्युस्त्वपरो राजा यस्मिन्नेकशतोऽभवत् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
चतुर्लक्षणजं त्वन्यं चतुर्वर्गं प्रचक्षते |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
चतुर्लक्षणवर्जं तु चतुष्कारणवर्जितम् |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२७
व्राह्मण उवाच
चतुर्वर्णानि दिव्यानि पुष्पाणि च फलानि च |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
चतुर्वर्षशतं चाय़ुस्त्वय़ा सार्धमवाप्स्यति |
५६ क
वन पर्व
अध्याय
२८२
सावित्र्यु उवाच
चतुर्वर्षशताय़ुर्मे भर्ता लव्धश्च सत्यवान् |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्वाहुः स्पृशन्मूर्ध्ना भूस्थितोऽपि नभस्तलम् |
४६ क