अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
चण्डालेन तु सौपाको मौद्गल्यसमवृत्तिमान् ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
भीष्म उवाच
चण्डालो व्रात्यवेनौ च व्राह्मण्यां क्षत्रिय़ासु च |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
चण्डाल उवाच
चण्डालोऽहं ततो राजन्भुक्त्वा तदभवं मृतः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२८
मतङ्ग उवाच
चण्डालय़ोनौ जातेन न तत्प्राप्यं कथञ्चन ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
चण्डालय़ोनौ जातो हि कथं व्राह्मण्यमाप्नुय़ात् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२२३
द्रौपद्यु उवाच
चण्डाश्च शौण्डाश्च महाशनाश्च; चौराश्च दुष्टाश्चपलाश्च वर्ज्याः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१२४
लोमश उवाच
चतस्र आय़ता दंष्ट्रा योजनानां शतं शतम् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
चतस्रः क्रमय़ोगेन कामाशां गन्तुमिच्छसि ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
युधिष्ठिर उवाच
चतस्रो विहिता भार्या व्राह्मणस्य पितामह |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
चतुःशताः शरवर्षैर्हताः पेतुः किरीटिना |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
चतुःशतान्द्विरदान्साय़ुधीय़ा; न्हत्वा रथानष्टशतं जघान |
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
चतुःशतैर्महेष्वासैश्चेकितानमवारय़म् ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
चतुःशीर्षस्ततः प्राह शक्रस्य दय़ितः सखा |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
चतुःषष्टिस्तथा श्लोकाः पर्वैतत्परिकीर्तितम् ||
१२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
गार्ग्य उवाच
चतुःषष्ट्यङ्गमददात्कालज्ञानं ममाद्भुतम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
चतुःसमुद्रपर्यन्तां मेरुमन्दरभूषणाम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
चतुःसमुद्रपर्याय़योगनिद्रात्मने नमः ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
चतुरङ्गं वलं वाणैर्निघ्नन्तं पाण्ड्यमाहवे |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
चतुरङ्गक्षय़े घोरे पूर्वं देवासुरोपमे ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
चतुरङ्गप्रवृत्तानि सङ्गस्थानानि मे शृणु ||
१३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
चतुरङ्गवलोपेता शाल्वराजाभिपालिता ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
चतुरन्ता मही व्याप्ता नासीत्किञ्चिदनावृतम् ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६९
शकुन्तलो उवाच
चतुरन्तामिमामुर्वीं पुत्रो मे पालय़िष्यति ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
चतुरश्च हय़ोदारांश्चतुर्भिः परमेषुभिः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९९
याज्ञवल्क्य उवाच
चतुरश्चापरान्पुत्रान्देहात्पूर्वं महानृषिः |
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
चतुरश्रा महाराज त्रय़स्त्रिंशत्तु मण्डलम् ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय
८
नारद उवाच
चतुरश्वः सदश्वोर्मिः कार्तवीर्यश्च पार्थिवः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
चतुरस्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ||
११३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ||
९५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
चतुराश्रमिणां पुण्यैः पावितानां सुरक्षितैः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
चतुरो मागधी सूते क्रूरान्माय़ोपजीविनः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
चतुरो वार्षिकान्मासान्यो मांसं परिवर्जय़ेत् |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
चतुरो व्राह्मणान्वैद्यान्प्रगल्भान्सात्त्विकाञ्शुचीन् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११९
नारद उवाच
चतुरोऽपश्यत नृपस्तेषां मध्ये पपात सः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
चतुर्गुणः क्षत्रिय़स्य वैश्यस्याष्टगुणः स्मृतः ||
४१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
चतुर्णां तव योधानां तैस्त्रिभिः पाण्डवैः सह ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
चतुर्णां मध्यमौ श्रेष्ठौ नित्यं शङ्क्यौ तथापरौ |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
चतुर्णां यत्र वर्णानां धर्मव्यतिकरो भवेत् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
चतुर्णां राजशार्दूल प्राहुराश्रमवासिनाम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
चतुर्णां लोकपालानां शुक्रस्याथ वृहस्पतेः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
चतुर्णां वय़मेतेषां निष्कृतिं नानुशुश्रुमः ||
२७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
११
धृतराष्ट्र उवाच
चतुर्णां शत्रुजातानां सर्वेषामातताय़िनाम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
चतुर्णामभय़ं देहि कामं युध्यस्व फल्गुनम् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्णामाश्रमाणां च राजधर्माश्च के मताः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
चतुर्णामिह वर्णानां कर्माणि च युधिष्ठिर ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्णामेव पापानामश्रु वै नापतत्तदा |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
चतुर्णामेव वर्णानां धर्मो नान्यस्य विद्यते |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८५
पराशर उवाच
चतुर्णामेव वर्णानामागमः पुरुषर्षभ |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
चतुर्थ औपनिषदो धर्मः साधारणः स्मृतः ||
२७ ख