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वन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
चिरं च तस्य कालोऽय़ं स च वाय़ुसमो जवे ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
वासुदेव उवाच
चिरं तिष्ठति मेदिन्यां शैले लेख्यमिवार्पितम् ||
४३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
चिरं ते जाग्रतस्तात स्वप तावन्निशामिमाम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
चिरं दोर्भ्यां परिष्वज्य चिरं जीवेत्युदाहृतः ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
चिरं धर्मान्निषेवेत कुर्याच्चान्वेषणं चिरम् ||
७२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
चिरं धारय़ते रोषं चिरं कर्म निय़च्छति |
७१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
चिरं पृच्छेच्चिरं व्रूय़ाच्चिरं न परिभूय़ते ||
७४ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
चिरं भुक्त्वा वसुमतीं प्रिय़ां कान्तामिव प्रभुः |
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
चिरं मुञ्चत वाष्पं च चिरं स्नेहेन पश्यत |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
चिरं विनीय़ चात्मानं चिरं यात्यनवज्ञताम् ||
७३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
चिरं वृद्धानुपासीत चिरमन्वास्य पूजय़ेत् |
७२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
चिरं सञ्चिन्तय़न्नर्थांश्चिरं जाग्रच्चिरं स्वपन् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
चिरं हि सर्वकार्याणि समेक्षावान्प्रपद्यते ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
चिरकारिं ददर्शाथ पुत्रं स्थितमथान्तिके ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
चिरकारिक भद्रं ते चिरकारी चिरं भव |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
चिरकारिक भद्रं ते भद्रं ते चिरकारिक |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
चिरकारिक भद्रं ते भद्रं ते चिरकारिक |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
चिरकारिषु धीरेषु गुणोद्देशसमाश्रय़ात् ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
चिरकारी तु पितरं दृष्ट्वा परमदुःखितः |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
चिरकारी महाप्राज्ञो गौतमस्याभवत्सुतः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
चिरकारी हि मेधावी नापराध्यति कर्मसु ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
चिरकारेस्तु यत्पूर्वं वृत्तमाङ्गिरसे कुले ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
चिरकार्याभिसम्पत्तेश्चिरकारी तथोच्यते ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
चिरकालाभिलषितो ममाय़ं तु मनोरथः |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
चिरकालेप्सितं दिष्ट्या हृदय़स्थमिदं मम |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
चिरकालेप्सितं लोके युद्धमद्यास्तु कौरव ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३८
रुद्र उवाच
चिरदृष्टो हि भगवान्वैराजसदने मय़ा |
१७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
नारद उवाच
चिरदृष्टोऽसि मे राजन्नागतोऽस्मि तपोवनात् |
५ क
विराट पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
चिरमन्तर्मना भूत्वा प्रत्युवाच सभासदः ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
चिरमन्तर्मना भूत्वा शोकोपहतचेतनः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
चिरमन्वास्य विदुषश्चिरं शिष्टान्निषेव्य च |
७३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ६
धृतराष्ट्र उवाच
चिरमस्म्युषितः पुत्र चिरं शुश्रूषितस्त्वय़ा |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
चिरमाशंसितो मात्रा चिरं गर्भेण धारितः |
५४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७
अर्जुन उवाच
चिररात्रेप्सितं कामं तद्भवान्कर्तुमर्हति ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
चिररात्रोषिताः स्मेह व्राह्मणस्य निवेशने |
३ क
वन पर्व
अध्याय ६६
वृहदश्व उवाच
चिरविप्रोषितां मातर्मामनुज्ञातुमर्हसि ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
चिरस्य खलु पश्यामि भगवन्तमुपस्थितम् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
चिरस्य दृष्ट्वा दाशार्हं राजानः सर्वपार्थिवाः |
५१ क
स्त्री पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
चिरस्य दृष्ट्वा पुत्रान्सा पुत्राधिभिरभिप्लुता |
१० क
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
चिरस्य दृष्ट्वा राजेन्द्र तेऽन्योन्यस्य प्रिय़ंवदे |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
चिरस्य दृष्ट्वा वार्ष्णेय़ं वाष्पमाहारय़त्पृथा ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
चिरस्य मृत्युकारिकामनागतां न वुध्यसे ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
चिरस्य वत दृष्टोऽहं दैवतैः सौम्यचक्षुषा ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २३
युधिष्ठिर उवाच
चिरादिदं कुशलं भारतस्य; श्रुत्वा राज्ञः कुरुवृद्धस्य सूत |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५२
युधिष्ठिर उवाच
चिराभिपन्नः कविभिः पूर्वं धर्म उदाहृतः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
चिराभिलषितं काममद्य प्राप्स्यामि संय़ुगे |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
चिराभिलषितं किञ्चित्फलमप्राप्तमेव ते |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
चिराभिलषितो ह्यद्य त्वय़ा सह समागमः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
चिरारव्धमिदं चापि सागरस्यापि मन्थनम् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय १०
व्यास उवाच
चिराय़ तव पुत्राणां शतमेकश्च पार्थिव |
२१ क