शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ामास कौरव्य किं कृतं सुकृतं भवेत् ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ामास च तदा फल्गुनः पुरुषर्षभः ||
७ ग
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
चिन्तय़ामास च मनुस्तं मत्स्यं पृथिवीपते |
३५ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ामास चास्त्राणि न च सस्मार तान्यपि ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ामास जिष्णुस्तु भगवन्तं हुताशनम् |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
चिन्तय़ामास तत्कार्यं सुमहत्पार्थिवं प्रति ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
५१
वृहदश्व उवाच
चिन्तय़ामास तत्कार्यं सुमहत्स्वां सुतां प्रति ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
चिन्तय़ामास तस्यैव वधोपाय़ं महात्मनः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ामास दुःखार्ता शर्मिष्ठां प्रति भारत ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
चिन्तय़ामास देवेन्द्रो मन्युनाभिपरिप्लुतः |
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ामास देवेशो वुद्धिं वुद्धिमतां वरः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ामास पुरुषं जगत्सर्गकरं प्रभुः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
चिन्तय़ामास मनसा किमिदं नु कृतं मय़ा ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
चिन्तय़ामास राजेन्द्र कथमेतद्भविष्यति ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ामास राजेन्द्र तदा स मुनिसत्तमः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ामास राजेन्द्र देवराजरथागमम् ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ामास रुदती तस्य दुःखस्य निर्णय़म् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
२१६
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ामास वरुणं लोकपालं दिदृक्षय़ा |
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
चिन्तय़ामास वार्ष्णेय़ो न नः कालात्ययो भवेत् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ामास विदुरस्तमृषिं संशितव्रतम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१७
सूत उवाच
चिन्तय़ामास वै चक्रं विष्णुर्दानवसूदनम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
७१
वृहदश्व उवाच
चिन्तय़ामास वैदर्भी कस्यैष रथनिस्वनः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
चिन्तय़ामास स मुनिः किं नु मे सुकृतं भवेत् |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
चिन्तय़ामास समरे धर्मराजो युधिष्ठिरः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ामास सर्पस्य वीर्यमत्यद्भुतं महत् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२९०
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ामास सा कन्या मन्त्रग्रामवलावलम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
चिन्तय़ामासुरव्यग्राः सुकृतं हि नृपस्य तत् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३९
व्रह्मो उवाच
चिन्तय़ामि गतिं चास्य न गतिं वेद्मि चोत्तमाम् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
चिन्तय़ित्वा चिरं ध्यात्वा अवहारमरोचय़त् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
चिन्तय़ित्वा ततः क्रूराः प्रतिजग्मुरथो गृहान् ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
चिन्तय़ित्वा ततो वह्निश्चक्रे संहारमात्मनः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
मार्कण्डेय़ उवाच
चिन्तय़ित्वा तदाश्चर्यं स्त्रिय़ा प्रोक्तमशेषतः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ित्वा तु पार्थेभ्यः प्रेषय़िष्यामि सञ्जय़म् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
चिन्तय़ित्वा तु राजेन्द्र ध्यानशोकपराय़णः |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
चिन्तय़ित्वा महावाहुः पिता देवव्रतस्तव |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
चिन्तय़ित्वा महावाहो भीष्मार्जुनसमागमम् ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ित्वा महाशापमृषिवित्रासिता भृशम् ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ित्वा मुहूर्तं च रोषाविष्टो द्विजोत्तमः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
चिन्तय़ित्वा मुहूर्तं तु कृत्वा निश्चय़मात्मनः |
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
चिन्तय़ित्वा मुहूर्तं तु तारा ताराधिपप्रभा |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ित्वा मुहूर्तं तु प्रत्युवाच तपोधनम् ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
चिन्तय़ित्वा मुहूर्तं स वाष्पपूर्णेक्षणः श्वसन् |
३२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
चिन्तय़ित्वा वचस्तेषां वालक्रीडां च सञ्जय़ |
५ क
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
चिन्तय़ित्वाध्यगाद्राजा वस्त्रार्धस्यावकर्तनम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वासुदेव उवाच
चिन्तय़िष्यसि तत्राग्र्या वुद्धिस्तव भविष्यति ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
चिन्तय़े तत्र चागत्य गन्धर्वो मामपृच्छत ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
चिन्तय़ेन्मनसा गङ्गां स गतिं परमां लभेत् ||
६९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
चिरं करोति क्षिप्रार्थे स मूढो भरतर्षभ ||
३४ ख
विराट पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
चिरं क्षान्तमिदं राजन्न मन्युर्विद्यते मम ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
चिरं गतास्तोय़हेतोर्न चागच्छन्ति भारत |
३३ क