द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
ग्राम्यारण्यानि भूतानि स्थावराणि चराणि च |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
ग्रामय़ाजी च कौन्तेय़ राज्ञश्च परिविक्रय़ी |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
ग्रावस्तोत्रं स सौभद्रः सम्यक्तत्र करिष्यति ||
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
ग्रावाणः शर्कराः कृत्वा प्रचक्रेऽभिषवं नृप ||
३३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
ग्रासमुष्टिं परगवे दद्यात्संवत्सरं तु यः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
ग्रासाच्छादनमत्यर्थं दद्यादिति निदर्शनम् |
५८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
ग्रासादाच्छादनाच्चान्यन्न गृह्णीय़ात्कथञ्चन |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
ग्राहं हत्वा मोक्षय़ध्वं मामिति त्वरय़न्निव ||
७० ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
ग्राहः पञ्चत्वमापेदे जङ्घां त्यक्त्वा महात्मनः ||
७३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०८
नार्यु उवाच
ग्राहभूता जले यूय़ं चरिष्यध्वं शतं समाः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०८
तापसा ऊचुः
ग्राहाः पञ्च वसन्त्येषु हरन्ति च तपोधनान् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१६९
मातलिरु उवाच
ग्राहितस्त्वं महेन्द्रेण पुरुषेन्द्र तदुत्तमम् ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
ग्राहेणानेन विपिने किमर्थं नाभिधावसि ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
ग्राहो जग्राह वलवाञ्जङ्घान्ते कालचोदितः ||
६९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
ग्राह्यं दृश्यं च श्राव्यं च यदिदं कर्म विद्यते |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
भीष्म उवाच
ग्राह्यः स्वय़ं हि देवेन मत्प्रत्यक्षं न संशय़ः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
ग्राहय़ामास दिव्यानि मानुषाणि च वीर्यवान् ||
४५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
ग्राहय़ामास पुरुषैर्हय़शिक्षाविशारदैः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
ग्राहय़ित्वा तु तं स्वार्थं मार्जारं मूषकस्तदा |
८० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
ग्रीवा चास्याभवद्राजन्कालरात्रिर्गुणोत्तरा ||
४८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
ग्रीवा वाहू तथा पादौ केशाश्चाद्भुतदर्शनाः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
ग्रीवाय़ां निय़ुतं चापि सहस्राणि च सप्ततिः ||
५२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
ग्रीवाय़ां शूरसेनस्तु तव पुत्रश्च मारिष |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
ग्रीवाय़ां शूरसेनाश्च दरदा मद्रकेकय़ाः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
ग्रीवाय़ास्तमृषिश्रेष्ठं नरमाप्नोत्यनुत्तमम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
ग्रीष्मे च पञ्चतपसः शश्वच्च मितभोजनाः ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
ग्रैवेय़ाण्यथ शक्तीश्च पताकाः कणपांस्तथा |
४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
ग्रैवेय़ैश्चित्ररूपैश्च रुक्मकक्ष्याभिरेव च |
६९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
ग्लहं च सैन्धवं राजन्नत्र द्यूतस्य निश्चय़ः |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय
५८
युधिष्ठिर उवाच
ग्लहं दीव्यामि चार्वङ्ग्या द्रौपद्या हन्त सौवल ||
३७ ख
सभा पर्व
अध्याय
५१
शकुनिरु उवाच
ग्लहान्धनूंषि मे विद्धि शरानक्षांश्च भारत |
३ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
ग्लानानां दुःखितानां च नाभ्यजानत पाण्डवः ||
३८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
ग्लाय़ते मे मनस्तात भूय़ो भूय़ः प्रजल्पतः |
१२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
ग्लाय़ते मे मनो हीदं मुखं च परिशुष्यति |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
गय़मामूर्तरय़सं मृतं शुश्रुम सृञ्जय़ |
१०४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
गय़स्य यजमानस्य गय़ेष्वेव महाक्रतुम् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१२१
लोमश उवाच
गय़स्य यजमानस्य तत्र तत्र विशां पते ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
५०
आस्तीक उवाच
गय़स्य यज्ञः शशविन्दोश्च राज्ञो; यज्ञस्तथा वैश्रवणस्य राज्ञः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
गय़स्य यज्ञे के त्वद्य प्राणिनो भोक्तुमीप्सवः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
गय़ां गय़शिरश्चैव विपाशां स्थूलवालुकाम् |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
गय़ाथ फल्गुतीर्थं च धर्मारण्यं सुरैर्वृतम् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
गय़ो यदकरोद्यज्ञे राजर्षिरमितद्युतिः ||
२५ ख