अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
ग्रहैर्वहुविधैः प्राणान्संरुद्धानुत्सृजत्यपि ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
ग्रहौ ताम्रारुणशिखौ प्रज्वलन्ताविव स्थितौ |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
ग्रहय़ुद्धं यथा घोरं प्रजासंहरणे अभूत् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
८७
यय़ातिरु उवाच
ग्राम एव वसन्भिक्षुस्तय़ोः पूर्वतरं गतः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
ग्रामं ग्रामशताध्यक्षो भोक्तुमर्हति सत्कृतः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१०७
वैशम्पाय़न उवाच
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५५
विदुर उवाच
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
ग्रामं प्रेक्ष्य जनाकीर्णं प्राविशद्भैक्षकाङ्क्षय़ा ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८५
भृगुरु उवाच
ग्रामं वा नगरे पञ्चरात्रिका ग्रामैकरात्रिकाः |
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
ग्रामकामं च गोपालं वनकामं च नापितम् ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
ग्रामकामं च गोपालं वनकामं च नापितम् ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
दस्यव ऊचुः
ग्रामणीर्भव नो मुख्यः सर्वेषामेव संमतः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
ग्रामणीश्च महीपालानेष जित्वा महावलः |
३३ क
विराट पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
ग्रामणीय़ैः समारूढाः कुशलैर्हस्तिसादिभिः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
ग्रामधान्यं यथा शून्यं यथा कूपश्च निर्जलः |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
ग्रामप्रेष्यो वार्धुषिको गाय़नः सर्वविक्रय़ी ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
ग्रामवच्च कृता रक्षा ते च सर्वे तदर्पणाः ||
७१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
ग्रामस्याधिपतिः कार्यो दशग्राम्यस्तथापरः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
११३
लोमश उवाच
ग्रामांश्च घोषांश्च सुतं च दृष्ट्वा; शान्तां च शान्तोऽस्य परः स कोपः |
२० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
ग्रामाग्रहारकुल्याढ्यो मणिहेमजलार्णवः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
ग्रामाञ्जनपदांश्चैव क्षेत्राणि च गृहाणि च ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
ग्रामाणां शतपालाय़ सर्वमेव निवेदय़ेत् ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
ग्रामान्निष्क्रम्य चारण्यं मुनिः प्रव्रजितो वसेत् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
ग्रामान्निष्क्रम्य मुनय़ो विगतक्रोधमत्सराः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
ग्रामान्पुराणि घोषांश्च पत्तनानि च वीर्यवान् |
३३ क
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
ग्रामान्राष्ट्राणि वा तस्य हरिष्यामो विभागशः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
७१
वृहदश्व उवाच
ग्रामान्वहूनतिक्रम्य नाध्यगच्छद्यथातथम् |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
ग्रामाय़ैके वनाय़ैके नाशाय़ैके प्रवव्रजुः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
ग्रामे गृहे वा यद्द्रव्यं पारक्यं विजने स्थितम् |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
पर्वत उवाच
ग्रामे चाधिकृतः सोऽस्तु खरय़ानेन गच्छतु |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
ग्रामे दस्युजनाकीर्णे व्यचरत्सर्वतोदिशम् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
ग्रामे यान्ग्रामदोषांश्च ग्रामिकः परिपालय़ेत् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
ग्रामे वनसुखाचारो यथा वनचरस्तथा ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
८६
अष्टक उवाच
ग्रामे वा वसतोऽरण्यं कथं भवति पृष्ठतः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
८६
यय़ातिरु उवाच
ग्रामे वा वसतोऽरण्यं स मुनिः स्याज्जनाधिप ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
ग्रामे शुचीनि प्रचरन्कुलानि भरतर्षभ |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
ग्रामैकरात्रिको ग्रीष्मे वर्षास्वेकत्र वा वसेत् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
ग्राम्निः क्षेमः समूहश्च दिव्यसानुस्तथैव च ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
ग्राम्यं वाराहमांसं च यच्चैवाप्रोक्षितं भवेत् |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
ग्राम्यधर्मान्न सेवेत स्वच्छन्देनार्थकोविदः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
ग्राम्यस्त्वेकः पशुस्तत्र नाजहाच्छ्वा महामुनिम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
ग्राम्यां वृत्तिं लिप्समानः कां गतिं याति जाजले |
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
ग्राम्याणां गोवृषश्चासि भगवाँल्लोकपूजितः ||
१५७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
ग्राम्याणां पुरुषः श्रेष्ठः सिंहश्चारण्यवासिनाम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
ग्राम्यादन्नान्निवृत्ताश्च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
ग्राम्यारण्या ओषधीश्च दुदुहे पय़ एव च |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
ग्राम्यारण्या ओषधय़ः प्राणस्यान्नमिति श्रुतिः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
ग्राम्यारण्या महात्मानं रन्तिदेवं यशस्विनम् ||
११५ ख