chevron_left  गाण्डीवप्रहितान्घोरानद्यarrow_drop_down
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवप्रहितान्घोरानद्य गात्रैः स्पृशञ्शरान् |
८३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
अर्जुन उवाच
गाण्डीवप्रेषिता वाणा मनोनिलसमा जवे |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय २३
युधिष्ठिर उवाच
गाण्डीवभृच्छत्रुसङ्घानुदस्य; स्वस्त्यागमत्कच्चिदेनं स्मरन्ति ||
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
गाण्डीवमभवद्राजन्पार्थस्य सृजतः शरान् ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७५
वैशम्पाय़न उवाच
गाण्डीवमाश्रित्य वली न व्यकम्पत शत्रुहा ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५५
वासुदेव उवाच
गाण्डीवमाय़म्य भवांश्चक्रं वाहं सुदर्शनम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
गाण्डीवमुक्ता विशिखाः सम्यगस्त्रप्रचोदिताः |
२ क
वन पर्व
अध्याय २५२
द्रौपद्यु उवाच
गाण्डीवमुक्तांश्च महाशरौघा; न्पतङ्गसङ्घानिव शीघ्रवेगान् |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवमुक्ताः क्षिण्वन्तो मम हस्तप्रचोदिताः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
गाण्डीवमुक्तान्नाराचान्प्रतिगृह्णात्यविह्वलः ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २३
युधिष्ठिर उवाच
गाण्डीवमुक्तान्स्तनय़ित्नुघोषा; नजिह्मगान्कच्चिदनुस्मरन्ति ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
गाण्डीवमुक्तैरभ्यघ्नमेकैकं दशभिर्मृधे |
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवमुक्तैरिषुभिर्महात्मा; सर्वा दिशो व्यावृणोदप्रमेय़ैः ||
८५ ख
विराट पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
गाण्डीवमुक्तैर्विशिखैः प्रणुन्ना; स्ते योधमुख्याः सहसापजग्मुः ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवमुक्तैर्विशिखैः सर्वतः शकलीकृतम् ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवमुक्तैस्तु सुवर्णपुङ्खैः; शितैः शरैः शोणितदिग्धवाजैः |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवमुपसंमृज्य तूर्णं जग्राह संय़ुगे ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
गाण्डीवमुपसङ्गृह्य वभूव मुदितोऽर्जुनः ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय ३८
वृहन्नडो उवाच
गाण्डीवमेतत्पार्थस्य लोकेषु विदितं धनुः ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
गाण्डीवविस्फारितशव्दमाजा; वशृण्वाना धार्तराष्ट्रा ध्रिय़न्ते |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवशव्दं तमथो विदित्वा; विराटराजप्रमुखा नृवीराः |
११५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवशव्देन मनांसि तेषां; किरीटमाली व्यथय़ां चकार ||
११३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवसृष्टा दास्यन्ति कर्णस्य परमां गतिम् ||
१४ ग
विराट पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
गाण्डीवस्य च घोषेण पृथिवी समकम्पत ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
गाण्डीवस्य च निर्घोषं प्रावृड्जलदनिस्वनम् ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवस्य च निर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवस्य च निर्घोषः श्रुतो दक्षिणतो मय़ा ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवस्य च निर्घोषमशृण्वन्व्यथितेन्द्रिय़ः ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवस्य च निर्घोषात्संहृष्यन्ति मनांसि नः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवस्य च निर्घोषे विप्रनष्टे समन्ततः |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवस्य च निर्घोषो वीर्याणि हरते हि नः ||
३३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवस्य च निर्घोषो व्यतिक्रम्यास्पृशद्दिवम् ||
३२ ख
विराट पर्व
अध्याय ४१
उत्तर उवाच
गाण्डीवस्य च शव्देन कर्णौ मे वधिरीकृतौ ||
१६ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवस्य महान्घोषः शुश्रुवे युधि मारिष ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
धृतराष्ट्र उवाच
गाण्डीवाग्निं प्रवेक्ष्यन्ति पतङ्गा इव पावकम् ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवाग्निं प्रवेक्ष्याम इति मे नास्ति संशय़ः ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
गाण्डीवाद्धि तदा सङ्ख्ये यथा भ्रमरपङ्क्तय़ः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
गाण्डीवास्त्रप्रणुन्नांस्तान्गतासून्नभसश्च्युतान् |
५० क
वन पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
गाण्डीवे वा संशय़िते कथं चि; द्राज्यप्राप्तिः संशय़िता भवेन्नः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५१
धृतराष्ट्र उवाच
गाण्डीवेद्धं दहेताजौ पुत्राणां मम वाहिनीम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
गात्रकम्पश्च सुमहाञ्श्वासश्चाप्यभवन्महान् |
२ ख
वन पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
गात्रसंस्पर्शसम्वन्धं त्र्यम्वकेण सहानघ |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
गात्राणि गात्रैरस्याहं सम्प्रवेक्ष्येऽभिरक्षितुम् ||
४६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
गात्राणि चात्यन्तसुखोचितानि; शिरांसि चेन्दुप्रतिमाननानि ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
गात्राणि चावसीदन्ति न च वुद्धिः प्रसीदति ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २३४
वैशम्पाय़न उवाच
गात्राणि चाहनद्भल्लैर्गन्धर्वाणां धनञ्जय़ः ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
गात्राणि प्राक्षिणोत्पार्थः शिरांसि च चकर्त ह ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
गात्राणि वाससी चैव प्रक्षाल्य सलिलेन सा ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
गात्राणि वाससी चैव प्रक्षाल्य सलिलेन सा ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४३
सञ्जय़ उवाच
गात्रात्सञ्च्यावय़ामास तदद्भुतमिवाभवत् ||
४ ख