उद्योग पर्व
अध्याय
१०५
नारद उवाच
कुतः कृतघ्नस्य यशः कुतः स्थानं कुतः सुखम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
कुतः क्षीरोदनं वत्स मुनीनां भावितात्मनाम् |
८२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
कुतः क्षीरोदनं वत्स सुखानि वसनानि च ||
८३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०५
नारद उवाच
कुतः पुष्टानि मित्राणि कुतोऽर्थाः सञ्चय़ः कुतः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
कुतः फलान्यवाप्तानि हेतुना केन खादसि ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
कुतः श्रमो भर्तृसमीपतो हि मे; यतो हि भर्ता मम सा गतिर्ध्रुवा |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
युधिष्ठिर उवाच
कुतः सृष्टमिदं विश्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
भीष्म उवाच
कुतः सृष्टमिदं विश्वं व्रह्मन्स्थावरजङ्गमम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७३
ऐल उवाच
कुतः स्विद्व्राह्मणो जातो वर्णाश्चापि कुतस्त्रय़ः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२८७
जनमेजय़ उवाच
कुतश्च कवचं तस्य कुण्डले चैव सत्तम |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
भीष्म उवाच
कुतश्चागम्यते सुभ्रु गन्तव्यं क्व च ते शुभे ||
१८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
कुतश्चापीदृशं सार्थमुपलप्स्यामहे वय़म् |
३८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
शिष्य उवाच
कुतश्चाहं कुतश्च त्वं तत्सत्यं व्रूहि यत्परम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
भीष्म उवाच
कुतश्चाहं कुतश्च त्वं तत्सम्यग्व्रूहि यत्परम् |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
कुतस्त्वं समनुप्राप्तो यज्ञं साधुसमागमम् ||
९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
कुतस्त्वमद्य विस्मृत्य वैरं द्वादशवार्षिकम् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
कुतस्त्वमसि सम्प्राप्तः कश्चासि पुरुषर्षभ |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
कुतो गन्तुं महावाहो पुरीं द्वारवतीं प्रति ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
शिष्य उवाच
कुतो जातानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
इन्द्र उवाच
कुतो दुःखं मानसं देहजं वा; पाण्डुर्विवर्णश्च कुतस्त्वमद्य |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
कुतो मामास्रवेद्दोष इति नित्यं विचिन्तय़ेत् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०५
नारद उवाच
कुतो मे भोजनश्रद्धा सुखश्रद्धा कुतश्च मे |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
कुतो युद्धं जातु नरः प्रजान; न्को दैवशप्तोऽभिवृणीत युद्धम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
ऐल उवाच
कुतो रुद्रः कीदृशो वापि रुद्रः; सत्त्वैः सत्त्वं दृश्यते वध्यमानम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
कुतो वात्मा दृढो रक्ष्यस्तन्मे व्रूहि पितामह ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
कुतो वाय़ं प्रश्वसिति उच्छ्वसित्यपि वा पुनः |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
कुतो हि तव सौभाग्यं यस्याः पुत्रो न राज्यभाक् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
युधिष्ठिर उवाच
कुतो ह्यस्य ध्रुवः स्वर्गः कुतो निःश्रेय़सं परम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१४८
कुन्त्यु उवाच
कुतोमूलमिदं दुःखं ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः |
१ क
विराट पर्व
अध्याय
११
विराट उवाच
कुतोऽसि कस्यासि कथं त्वमागतः; प्रव्रूहि शिल्पं तव विद्यते च यत् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०७
भीष्म उवाच
कुतोऽहमागतः कोऽस्मि क्व गमिष्यामि कस्य वा |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
कुत्सा विकत्था मात्सर्यं पापं दुष्करकारिता |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५७
भीष्म उवाच
कुत्सा सञ्जाय़ते राजन्नुपेक्षाभिः प्रशाम्यति ||
१५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
कुत्सितेनाभ्युपाय़ेन निधनं समवाप्स्यसि ||
४१ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
कुथाः पताकाम्वरवेष्टिताश्च; किरीटमाला मुकुटाश्च शुभ्राः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
श्रीकृष्ण उवाच
कुथाभिश्च विचित्राभिर्वरूथैश्च महाधनैः |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
कुथाश्च वहुधाकाराश्चामरव्यजनानि च ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
कुद्दालपाटीपिटकं प्रकीर्णं कांस्यभाजनम् |
५९ क
वन पर्व
अध्याय
१०५
लोमश उवाच
कुद्दालैर्ह्रेषुकैश्चैव समुद्रमखनंस्तदा ||
१९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
कुनरैर्दुरवापान्हि लोकान्प्राप्स्यन्त्यनुत्तमान् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
कुनृपस्य यथा राष्ट्रं दुर्भिक्षव्याधितस्करैः |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
कुन्तलैश्च दशार्णैश्च मागधैश्च विशां पते ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
कुन्तिभोजं ततो रक्षो विद्ध्वा वहुभिराय़सैः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२८७
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्तिभोजं पुरा राजन्व्राह्मणः समुपस्थितः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
कुन्तिभोजः शतानीको महत्या सेनय़ा वृतः ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
कुन्तिभोजश्च चैद्यश्च चक्षुष्यास्तां जनेश्वर ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
कुन्तिभोजश्च विक्रान्तो द्रुपदश्च महारथः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
कुन्तिभोजसुतश्चापि विन्दं विव्याध साय़कैः |
७२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्तिभोजसुता चैव गान्धारीमन्ववर्तत |
८ क