शल्य पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
किमिदानीं ददासि त्वं को हि ते चित्तविभ्रमः |
५७ क
वन पर्व
अध्याय
२१८
स्कन्द उवाच
किमिन्द्रः सर्वलोकानां करोतीह तपोधनाः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
इन्द्र उवाच
किमिष्यते धर्मभृतां वरिष्ठ; यद्द्रष्टुकामोऽसि तमप्रमेय़म् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
किमिहागमने चापि कार्यं ते राक्षसेश्वर |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
किमिहानन्तरं कार्यं ज्याय़िष्ठं तव रोचते ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
किमिय़ं द्रवते सेना त्रस्तरूपेव भारत |
९० क
उद्योग पर्व
अध्याय
११७
नारद उवाच
किमिय़ं पूर्वमेवेह न दत्ता मम गालव |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
भीष्म उवाच
किमिय़ं वक्ष्यतीत्येवं विमृशन्भृगुसत्तमः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
किमीदृशं नृशंसेन मय़ा कृतमवुद्धिना |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
किमीप्सितं पाण्डवेय़ व्रूहि किं करवाणि ते |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सूत उवाच
किमु चैतत्समासाद्य वीर संय़ुगगोष्पदम् ||
१७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
धृतराष्ट्र उवाच
किमु पाण्डुसुता राजन्गतसत्त्वा विचेतसः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
किमु पाण्डुसुतान्युद्धे सवलान्सपदानुगान् ||
६७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
किमु पाण्डुसुतान्युद्धे हीनवीर्यपराक्रमान् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
किमु पाण्डुसुतान्युद्धे हीनवीर्यपराक्रमान् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
किमु पाण्डुसुतान्वीरान्ससुहृद्गणवान्धवान् |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
किमु पार्था महात्मानं मर्त्यभूतास्तथावलाः |
१०५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
दुर्योधन उवाच
किमु पार्थाः सपाञ्चालाः सत्यमेतद्वचो मम ||
८१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
किमु भीष्मो रणे वीरा गतसत्त्वोऽल्पजीवितः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
किमु मानुषमात्रेण शक्यः स्यात्प्रतिवीक्षितुम् |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
किमु यत्र जनोऽय़ं वै पृथा चामित्रकर्शन ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
किमु लोकान्तरगतान्राज्ञो दर्शय़ितुं सुतान् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
युधिष्ठिर उवाच
किमुक्तः पुण्डरीकाक्ष तन्नः शंसितुमर्हसि ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
युधिष्ठिर उवाच
किमुक्तवांश्च भगवन्नेतदिच्छामि वेदितुम् |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
धृतराष्ट्र उवाच
किमुक्तवान्परं तस्मात्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
धृतराष्ट्र उवाच
किमुक्तवान्महेष्वासो भीष्मः प्रहरतां वरः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
युधिष्ठिर उवाच
किमुक्तवान्हृषीकेश दुर्योधनममर्षणम् |
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
किमुक्ष्णावहता कृत्यं किं धेन्वा चाप्यदुग्धय़ा |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
ऋचीक उवाच
किमुताग्निं समाधाय़ मन्त्रवच्चरुसाधने ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
किमुत्तरं तदा ते स्यात्सखे सत्यं व्रवीहि मे ||
७३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
युधिष्ठिर उवाच
किमुत्तरं तदा तौ स्म चक्रतुस्तेन भाषिते |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
किमुपहरामि गुर्वर्थमिति ||
९९ 5
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं पराय़णम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
किमेकं यज्ञिय़ं साम किमेकं यज्ञिय़ं यजुः |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
किमेतत्कथमुत्पन्नं फलय़ोगं च शंस मे ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
वैशम्पाय़न उवाच
किमेतत्क्रिय़ते कर्म फलं चास्य किमिष्यते ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
किमेतत्तपसो वीर्यं येनाय़ं जीवितः पुनः |
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
किमेतदिति तत्त्वेन प्रव्रूहि भरतर्षभ |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
किमेतद्गुह्यवचनं श्रोतुमिच्छामि पार्थिव ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
श्रीरु उवाच
किमेतद्वः क्षमं गावो यन्मां नेहाभ्यनन्दथ |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
किमेतन्महदाश्चर्यमभवद्यदुनन्दन |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
जनमेजय़ उवाच
किमेतान्येकनिष्ठानि पृथङ्निष्ठानि वा मुने |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
धृतराष्ट्र उवाच
किम्प्रमाणा हय़ास्तस्य रथकेतुर्धनुस्तथा |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
किमय़ं चार्यते वाजी स्त्रीमध्य इव भारत |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
किमय़ं सदृशं कञ्चिन्नृपतिं नैव दृष्टवान् ||
५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
किमय़ं स्यन्दनो युक्तः किं च कार्यं चिकीर्षितम् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
किरञ्शरगणान्राजन्नरवारणवाजिषु ||
४२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
किरञ्शरशतांस्तीक्ष्णान्वारिधारा इवाम्वुदः ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
किरञ्शरशतांस्तीक्ष्णान्विमुञ्चन्कर्णमूर्धनि ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
किरञ्शरशतानीव विनिघ्नंस्तव वाहिनीम् ||
३० ख