वन पर्व
अध्याय
२७८
नारद उवाच
किमर्थं युवतीं भर्त्रे न चैनां सम्प्रय़च्छसि ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३
शौनक उवाच
किमर्थं राजशार्दूलः स राजा जनमेजय़ः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१०६
युधिष्ठिर उवाच
किमर्थं राजशार्दूलः सगरः पुत्रमात्मजम् |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
जनमेजय़ उवाच
किमर्थं राजशार्दूलो धर्मराजो युधिष्ठिरः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
युधिष्ठिर उवाच
किमर्थं व्यचरद्राजन्नुशना तस्य धीमतः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१०
रुरुरु उवाच
किमर्थं शप्तवान्क्रुद्धो द्विजस्त्वां भुजगोत्तम |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
२२०
जनमेजय़ उवाच
किमर्थं शार्ङ्गकानग्निर्न ददाह तथागते |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
युधिष्ठिर उवाच
किमर्थं स परिभ्रष्टो विवेश विवरं भुवः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
किमर्थं सरुजस्तेऽहं सुखसुप्तः प्रवोधितः ||
७४ ख
वन पर्व
अध्याय
१०२
युधिष्ठिर उवाच
किमर्थं सहसा विन्ध्यः प्रवृद्धः क्रोधमूर्छितः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
किमर्थं सूतपुत्रेण न मुक्ता फल्गुने तु सा ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
किमर्थं सेवसे वृक्षं यदा महदिदं वनम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
किमर्थमनृतं कर्म कर्तुं राजंस्त्वमिच्छसि ||
६९ ख
वन पर्व
अध्याय
११
मैत्रेय़ उवाच
किमर्थमनय़ं घोरमुत्पतन्तमुपेक्षसे ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
किमर्थमभिसन्त्यज्य परिव्रजसि निष्क्रिय़ः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
किमर्थमभिहत इति |
८ ग
वन पर्व
अध्याय
१०२
लोमश उवाच
किमर्थमभिय़ाताः स्थ वरं मत्तः किमिच्छथ |
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४
शल्य उवाच
किमर्थमसि सम्प्राप्ता विज्ञातश्च कथं त्वहम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२४८
वैशम्पाय़न उवाच
किमर्थमागता सुभ्रूरिदं कण्टकितं वनम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२०
वैशम्पाय़न उवाच
किमर्थमावृता लोका ममैते तपसार्जिताः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
भीष्म उवाच
किमर्थमिह न प्राप्तो दर्शनं स हरिर्विभुः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
९७
लोमश उवाच
किमर्थमुपय़ाताः स्थ व्रूत किं करवाणि वः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
किमर्थमेतन्नाख्यातं त्वय़ा कृष्ण रणे मम |
६० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
किमर्थोऽय़ं तवारम्भः करिष्ये व्रूहि माचिरम् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१००
वासुदेव उवाच
किमवश्यं धरे कार्यं किं वा कृत्वा सुखी भवेत् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
शुक उवाच
किमवश्यं निवस्तव्यमाश्रमेषु वनेषु च ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
किमवस्थं तु तत्क्षत्रं ये च तत्राभवन्नृपाः ||
२१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
किमवस्थः समासाद्य प्रज्ञाचक्षुर्हतात्मजः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
किमवागुपविष्टोऽसि प्रेक्षमाणो जनार्दन ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
भीष्म उवाच
किमव्यक्तं परं व्रह्म तस्माच्च परतस्तु किम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
५३
देवा ऊचुः
किमव्रवीच्च नः सर्वान्वद भूमिपतेऽनघ ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५९
धृतराष्ट्र उवाच
किमव्रवीत्तदा सूत वलदेवो महावलः ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
किमव्रवीत्त्वा सङ्ग्रामे सुभद्रां मातरं प्रति |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
धृतराष्ट्र उवाच
किमव्रवीत्पाण्डवेय़ांस्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
धृतराष्ट्र उवाच
किमव्रवीद्रथोपस्थे राधेय़ं परवीरहा |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
जनमेजय़ उवाच
किमव्रवीन्महावाहुः सर्वधर्मविशारदः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
जनमेजय़ उवाच
किमव्रूतां महात्मानौ नरनाराय़णावृषी |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
धृतराष्ट्र उवाच
किमसौ पाण्डवो राजा धर्मपुत्रोऽभ्यभाषत |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
किमस्माकं भवेच्छ्रेय़ः किं कार्यमवशिष्यते |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
किमस्माभिः कृतं तेषां कस्मिन्वा पुनरागसि |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
किमस्य ऋषिपूगस्य त्यक्तसङ्गस्य नित्यशः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
किमहं कातरो द्रौणे पृथग्जन इवाहवे |
६० क
उद्योग पर्व
अध्याय
११०
नारद उवाच
किमहं पूर्वमेवेह भवता नाभिचोदितः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
किमहं व्रुवाणीति ||
२ ग
आदि पर्व
अध्याय
४
महाभारत कथा
किमहं व्रुवाणीति ||
२ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
किमाकाशे वय़ं सर्वे प्रलपाम मुहुर्मुहुः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११९
नारद उवाच
किमागमनकृत्यं ते किं कुर्वः शासनं तव |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
किमागमनकृत्यं ते कौरव्यकुलनन्दिनि |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
किमागमनमाचक्ष्व भगवन्कृतमेव तत् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
भीष्म उवाच
किमागमनमित्येव पर्यपृच्छत पार्थिवः ||
९ ख