सभा पर्व
अध्याय
३४
शिशुपाल उवाच
किमन्यदवमानाद्धि यदिमं राजसंसदि |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
किमन्यद्दैवसंय़ोगान्मन्यसे पुरुषाधम ||
६१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२३
धृतराष्ट्र उवाच
किमन्यद्दैवसंय़ोगान्मम पुत्रस्य चाभवत् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५१
सञ्जय़ उवाच
किमन्यद्राक्षसानन्यानस्मांश्च परिभूय़ ह ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९६
कर्ण उवाच
किमन्यद्विहितान्नूनं तस्य सा पुरुषेन्द्रता |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
धृतराष्ट्र उवाच
किममन्यत दुर्धर्षः प्रविष्टे शत्रुतापने |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
धृतराष्ट्र उवाच
किममन्यन्त सैन्यानि प्रविष्टे शत्रुतापने |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
धृतराष्ट्र उवाच
किमर्जुनश्चाप्यकरोत्संशप्तकवलं प्रति |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५२
राम उवाच
किमर्थं कुरुणा कृष्टं क्षेत्रमेतन्महात्मना |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
धृतराष्ट्र उवाच
किमर्थं क्रूरकर्माणं यमकालान्तकोपमम् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
किमर्थं क्लिश्यसे भद्रे तथ्यमेतद्व्रवीहि मे ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
किमर्थं च गिरिर्दग्धः सपक्षिगणकाननः ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
किमर्थं च जगत्सर्वं शरीरस्थं तवानघ |
१२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
५१
जनमेजय़ उवाच
किमर्थं च तपस्तेपे को वास्या निय़मोऽभवत् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
किमर्थं च त्वय़ा विद्धो मृगोऽय़ं मत्परिग्रहः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
४२
पितर ऊचुः
किमर्थं च त्वय़ा व्रह्मन्न कृतो दारसङ्ग्रहः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
किमर्थं च नरव्याघ्र न वधं तस्य काङ्क्षसि |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
किमर्थं च पुनर्देव प्रकृतिस्थः क्षणात्कृतः |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
११०
युधिष्ठिर उवाच
किमर्थं च भय़ाच्छक्रस्तस्य वालस्य धीमतः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
२०८
वैशम्पाय़न उवाच
किमर्थं च महत्पापमिदं कृतवती पुरा ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
किमर्थं च महीपालानवधीः क्रोधमूर्छितः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१३५
युधिष्ठिर उवाच
किमर्थं च यवक्रीत ऋषिपुत्रो व्यनश्यत ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
किमर्थं च विषादस्ते तद्व्रूहि वदतां वर |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२३५
वैशम्पाय़न उवाच
किमर्थं च सदारोऽय़ं निगृहीतः सुय़ोधनः ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४१
जनमेजय़ उवाच
किमर्थं च सरिच्छ्रेष्ठा तमृषिं प्रत्यवाहय़त् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
जनमेजय़ उवाच
किमर्थं चाध्वरे व्रह्मन्निज्यन्ते त्रिदिवौकसः ||
१२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
किमर्थं चैतदुत्पाट्य भूमौ लिङ्गं प्रवेरितम् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३
पितर ऊचुः
किमर्थं चैव नः शोच्याननुकम्पितुमर्हसि ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
किमर्थं चोद्गतो मन्युरगस्त्यस्य महात्मनः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
४६
तक्षक उवाच
किमर्थं तं मय़ा दष्टं सञ्जीवय़ितुमिच्छसि |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
युधिष्ठिर उवाच
किमर्थं तत्समभवद्वपुर्देवोपकल्पितम् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
किमर्थं तप्यते देवि तपो घोरमनिन्दिते ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
भीष्म उवाच
किमर्थं तप्यसे पुत्र श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
किमर्थं तव सैन्यानि न हनिष्यन्ति भारत ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
५६
जनमेजय़ उवाच
किमर्थं ते नरव्याघ्राः शक्ताः सन्तो ह्यनागसः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
किमर्थं ते ललाटे वै तृतीय़ं नेत्रमुत्थितम् |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
किमर्थं द्रवसे युद्धे यौवराज्यमवाप्य हि ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
किमर्थं धार्तराष्ट्राणां सहन्ते दुर्वलीय़साम् ||
६७ ख
विराट पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
किमर्थं नीतिमान्पार्थः श्रेय़ो नैषां करिष्यति ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय
६७
विराट उवाच
किमर्थं पाण्डवश्रेष्ठ भार्यां दुहितरं मम |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
२१०
वैशम्पाय़न उवाच
किमर्थं पाण्डवेमानि तीर्थान्यनुचरस्युत ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
किमर्थं भगवन्घोरा महोत्पाताः समुत्थिताः |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय
४२
जनमेजय़ उवाच
किमर्थं भगवाञ्शक्रो व्रह्महत्यामवाप्तवान् |
२७ क
सभा पर्व
अध्याय
२८
जनमेजय़ उवाच
किमर्थं भगवानग्निः प्रत्यमित्रोऽभवद्युधि |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४६
जनमेजय़ उवाच
किमर्थं भगवानग्निः प्रनष्टो लोकभावनः |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
जनमेजय़ उवाच
किमर्थं भगवान्सोमो यक्ष्मणा समगृह्यत |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
दुर्योधन उवाच
किमर्थं भरतश्रेष्ठ न हन्यास्त्वं शिखण्डिनम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१२१
युधिष्ठिर उवाच
किमर्थं भार्गवश्चापि कोपं चक्रे महातपाः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
किमर्थं मां प्राकृतवदुपप्रेक्षसि संसदि |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१२
रुरुरु उवाच
किमर्थं मोक्षिताश्चैव पन्नगास्तेन शंस मे |
२ क