शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
किं न्वत्र सुकृतं कार्यं भवेदिति विचिन्तय़न् ||
११ ग
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
किं न्वद्य कर्तव्यमिति प्रजाभिः; शङ्का मिथः सञ्जनिता नराणाम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
किं न्वस्य दुष्कृतेऽस्माभिः सम्प्राप्तव्यं भविष्यति |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
किं न्विदं त्विति विज्ञाय़ विस्मय़ं परमं गताः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१७
देवा ऊचुः
किं न्विमे मानवाः सर्वे दह्यन्ते कृष्णवर्त्मना |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
युधिष्ठिर उवाच
किं परं व्रह्मचर्यस्य किं परं धर्मलक्षणम् |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
किं पाण्डवांस्त्वं न जहासि कृष्णे; सुदुर्वलान्पतितान्हीनसत्त्वान् ||
३९ ख
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
किं पाण्डवांस्त्वं पतितानुपास्से; मोघः श्रमः षण्ढतिलानुपास्य |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११३
युधिष्ठिर उवाच
किं पार्थिवेन कर्तव्यं किं च कृत्वा सुखी भवेत् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
किं पुनः पाण्डवाः सर्वे समाश्वसिहि सैन्धव ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
किं पुनः पाण्डवास्तात सर्वास्त्रकुशला रणे ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
किं पुनः पाण्डवेय़ानां मातिशङ्कीर्वचो मम ||
१८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
किं पुनः पुरुषव्याघ्राः पतय़ो मे नरर्षभाः |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
किं पुनः पृथिवीशूरैर्योधव्रातैः समावृतः |
८३ क
विराट पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
किं पुनः प्राकृतैः पार्थः शक्यो विज्ञातुमन्ततः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
किं पुनः शरसङ्घातैश्चितस्य तव भारत ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११३
नारद उवाच
किं पुनः श्यामकर्णानां हय़ानां द्वे चतुःशते ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२२८
धृतराष्ट्र उवाच
किं पुनः स कृतास्त्रोऽद्य न हन्याद्वो महारथः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४१
भीम उवाच
किं पुनः सहदेवं च मां च कृष्णां च भारत ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
किं पुनः सहिता वीराः कृतवैराश्च पाण्डवैः ||
२४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
किं पुनर्गुणवन्तस्ते त्वत्प्रसादाभिकाङ्क्षिणः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
किं पुनर्द्रौपदेय़ाभ्यां सहितः सात्वतर्षभः ||
३२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
किं पुनर्दय़ितं जातं स्वस्रीय़स्यात्मजं मृतम् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
किं पुनर्धर्मशीलस्य मम वा मद्विधस्य वा ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
किं पुनर्धार्तराष्ट्रस्य वलमेतत्सुदुर्वलम् ||
८७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
किं पुनर्धार्तराष्ट्राणां लुव्धानां पापचेतसाम् ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
किं पुनर्धृतराष्ट्रस्य पुत्रं दुर्द्यूतदेविनम् |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
किं पुनर्मम दुष्पुत्रैः क्लिष्टः सम्प्रति पाण्डवः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
नहुष उवाच
किं पुनर्मां तपोहीनं वाहुवीर्यपराय़णम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
किं पुनर्मानुषे लोके मानुषैरकृतात्मभिः |
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
किं पुनर्मामितो विप्रा निवर्तध्वं यथेष्टतः ||
४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
किं पुनर्योधशेषस्य प्रसुप्तस्य विशेषतः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
किं पुनर्योऽसि सत्त्वानां सर्वेषां व्राह्मणोत्तमः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
किं पुनर्योऽहमासक्तस्तत्र तत्र सहस्रधा |
५५ क
आदि पर्व
अध्याय
२१६
वैशम्पाय़न उवाच
किं पुनर्वज्रिणैकेन पन्नगार्थे युय़ुत्सुना ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
३८
शमीक उवाच
किं पुनर्वाल एव त्वं तपसा भावितः प्रभो |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
किं पुनर्व्राह्मणाः पार्थ क्षत्रिय़ा वा वहुश्रुताः |
५७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
किं पुनर्व्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षय़स्तथा |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
किं पुनर्हन्यमानानां तरसा जीवितार्थिनाम् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
दुर्योधन उवाच
किं पुनस्त्वय़ि दुर्धर्षे सेनापत्ये व्यवस्थिते |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
किं प्राप्तं किं नु कर्तव्यं किं वा कृत्वा कृतं भवेत् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
सावित्र्यु उवाच
किं प्रार्थय़सि विप्रर्षे किं चेष्टं करवाणि ते |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
किं प्रय़च्छामि भगवन्नाज्ञापय़तु मां गुरुः ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
ऋचीक उवाच
किं प्रय़च्छामि राजेन्द्र तुभ्यं शुल्कमहं नृप |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
युधिष्ठिर उवाच
किं फलं जपतामुक्तं क्व वा तिष्ठन्ति जापकाः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९४
युधिष्ठिर उवाच
किं फलं ज्ञानय़ोगस्य वेदानां निय़मस्य च |
१ क
वन पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
किं फलं तस्य कार्त्स्न्येन तद्व्रह्मन्वक्तुमर्हसि ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
किं फलं तस्य विप्रर्षे तन्मे व्रूहि तपोधन ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
किं फलं व्राह्मणेष्वस्ति पूजाय़ां मधुसूदन |
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
किं भक्ष्यं किमभक्ष्यं च किं च देय़ं प्रशस्यते |
२ क