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शान्ति पर्व
अध्याय १३७
व्रह्मदत्त उवाच
कालेनैव प्रवर्तन्ते कः कस्येहापराध्यति ||
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
कालेनोत्पथगन्तासि शक्ये सति यथापथि ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १०१
विष्णुरु उवाच
कालेय़ इति विख्यातो गणः परमदारुणः |
७ क
वन पर्व
अध्याय ९८
लोमश उवाच
कालेय़ा इति विख्याता गणाः परमदारुणाः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
कालेय़ाः सम्प्रवर्तन्त त्रैलोक्यस्य विनाशने ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १०२
लोमश उवाच
कालेय़ास्तु यथा राजन्सुरैः सर्वैर्निषूदिताः |
१५ क
मौसल पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
कालो गन्तुं गतिं मुख्यां भवतामपि भारत |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११४
नारद उवाच
कालो गन्तुं नरश्रेष्ठ भिक्षार्थमपरं नृपम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२५
व्यास उवाच
कालो गिरति विज्ञानं कालो वलमिति श्रुतिः |
१३ क
मौसल पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
कालो गृहाणि सर्वेषां परिचक्राम नित्यशः ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
कालो दण्डमिवोद्यम्य गदापाणिरय़ुध्यत ||
३७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
व्रह्मदत्त उवाच
कालो दहति भूतानि सम्प्राप्याग्निरिवेन्धनम् ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
कालो दुर्योधनं हन्तुं सानुवन्धमरिन्दम |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
विरूप उवाच
कालो धर्मस्तथा मृत्युः कामक्रोधौ तथा युवाम् ||
११५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
कालो न परिहार्यश्च न चास्यास्ति व्यतिक्रमः ||
९६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
व्रह्मदत्त उवाच
कालो नित्यमुपाधत्ते सुखं दुःखं च देहिनाम् ||
४८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
कालो नूनं महाराज लोकेऽस्मिन्वलवत्तरः |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
कालो नूनं महावीर्यः सर्वलोकदुरत्ययः |
५६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
कालो भूत्वा महातेजाः संवर्तक इवानलः ||
१८४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
कालो महांस्त्वतीतो मे शूरपुत्रमपश्यतः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
कालो मृत्युर्यमश्चैव समाय़ास्यन्ति तेऽन्तिकम् |
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
कालो यमश्च मृत्युश्च यमस्यानुचराश्च ये ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
कालो विकुरुते भावान्सर्वाँल्लोके शुभाशुभान् |
१८९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
कालो हरति सम्प्राप्तो नदीवेग इवोडुपम् ||
९८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
कालो हेतुं विकुरुते स्वार्थस्तमनुवर्तते |
१५१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८२
भीष्म उवाच
कालोत्सृष्टां प्रज्वलितामिवोल्कां; सन्दीप्ताग्रां तेजसावृत्य लोकान् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
कालोदं त्वेव गन्तासि लव्धाय़ुर्जीविते पुनः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२७
व्यास उवाच
कालोदकेन महता वर्षावर्तेन सन्ततम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
कालोदय़े तच्च ततश्च भूय़ः; कर्ता भवान्कर्म न संशय़ोऽस्ति ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
कालोपमं ततो मेने सुतसोमस्य धीमतः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
कालोपसृष्टाः कालेय़ा घ्नन्तो द्विजगणान्वहून् ||
६ ग
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
कालोपहतचित्तो हि सर्वो मुह्यति भारत |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
श्रीभगवानु उवाच
कालोऽस्मि लोकक्षय़कृत्प्रवृद्धो; लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
कालोऽय़ं दारुणः प्राप्तो भरतानामभूतय़े |
४८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
कालोऽय़ं पुत्ररूपेण तव जातो विशां पते |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
कालोऽय़ं भीमरूपेण कलिङ्गैः सह युध्यते ||
९६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
कालोऽय़मिति सञ्चिन्त्य शिखण्डिनमचोदय़त् ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
काल्यं काल्यं विंशतिं वै दिनानि; तथैव चान्यानि दिनानि त्रीणि ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
काल्यं घृतं चान्ववेक्षन्प्रय़ता व्रह्मचारिणः |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
भीष्म उवाच
काल्यमर्थं निषेवेत ततो धर्ममनन्तरम् |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
काल्यमानं वलं दृष्ट्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
काल्यमाना यथा गावः पालेन रणमूर्धनि ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
धृतराष्ट्र उवाच
काल्यमानान्हि मे पुत्रान्भीमेनावेक्ष्य संय़ुगे |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
काल्यमानेषु सैन्येषु शैनेय़ेन ततस्ततः |
१ क
वन पर्व
अध्याय २२७
वैशम्पाय़न उवाच
काल्यमेव गमिष्यामि समीपं पार्थिवस्य ह ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
कालय़ामास तत्सैन्यं यथा पशुगणान्वृकः ||
४४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
कालय़ामास वलवान्पालः पशुगणानिव ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
कालय़ुक्तं च चित्रं च स्वतय़ा चाभिभाषितम् ||
१ ख