भीष्म पर्व
अध्याय
४१
शल्य उवाच
कामं योत्स्ये परस्यार्थे वृतोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ||
८० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
कामं योत्स्ये परस्यार्थे व्रूहि यत्ते विवक्षितम् ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
कामं वध्यतु मे सैन्यं नाहं योत्स्ये महात्मना |
८९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
कामं विश्वासय़ेदन्यान्परेषां तु न विश्वसेत् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
कामं स तव तुष्टात्मा कुर्याच्छापविमोक्षणम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
कामं संरक्षते दण्डस्त्रिवर्गो दण्ड उच्यते ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१६
अर्जुन उवाच
कामं सम्प्रज्वलाद्यैव कल्यौ स्वः साह्यकर्मणि ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
कामं सर्वं प्रदास्यामि न त्वात्मानं कदाचन ||
१७० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
कामं स्वपितु वालोऽय़ं भूमौ प्रेतगतिं गतः |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
३६
उत्तर उवाच
कामं हरन्तु मत्स्यानां भूय़ांसं कुरवो धनम् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
कामं हित्वार्थवान्भवति लोभं हित्वा सुखी भवेत् ||
५७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६१
गन्धर्व उवाच
कामः कमलगर्भाभे प्रतिविध्यन्न शाम्यति ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५३
भीष्म उवाच
कामः क्रोधश्च दर्पश्च तन्द्रीरालस्यमेव च ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
कामः क्रोधश्च लोभश्च दर्पः स्तम्भो विकत्थनम् |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रय़ं त्यजेत् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८१
भरद्वाज उवाच
कामः क्रोधो भय़ं लोभः शोकश्चिन्ता क्षुधा श्रमः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
कामः क्रोधो भय़ं लोभो मदः स्तम्भोऽथ मत्सरः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
कामः सम्पद्यतामस्य वीभत्सोराशु मां प्रति |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
कामकामाः स्वर्गकामा यज्ञांस्तन्वन्ति चापरे ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
कामकामी लभेत्कामं दीर्घमाय़ुरवाप्नुय़ात् |
१०४ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
कामकारः सखीनां हि सोपहासं प्रभाषितुम् ||
५९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
कामकारकराः सिद्धास्त्रैलोक्यस्येश्वरेश्वराः |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
गरुड उवाच
कामकारवरं दत्त्वा पुनश्चलितवानसि ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
कामकारेण दण्डं तु यः कुर्यादविचक्षणः |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
कामकूलामपारान्तां मनःस्रोतोभय़ावहाम् |
५७ क
वन पर्व
अध्याय
८८
धौम्य उवाच
कामकृद्यो द्विजातीनां श्रुतस्तात मय़ा पुरा |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
कामक्रोधग्राहवतीं पञ्चेन्द्रिय़जलां नदीम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८५
भृगुरु उवाच
कामक्रोधदर्पमोहलोभकार्पण्यदम्भपरिवादाभिमानहिंसानिवृत्ता इति ||
३ ग
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
कामक्रोधद्वेषमुक्ता निःसङ्गा वीतकल्मषाः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
कामक्रोधपरित्यागः शिष्टाचारनिषेवणम् ||
९१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
कामक्रोधविय़ुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
कामक्रोधव्यपेता ये निर्ममा निरहङ्कृताः |
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
कामक्रोधसमाय़ुक्तो हिंसालोभसमन्वितः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
कामक्रोधादिभिर्भावैर्युक्तो राजसतामसैः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
कामक्रोधानुवर्ती हि यो मोहाद्विरुरुत्सते |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
कामक्रोधाभिभूतास्ते माय़ाव्याजोपजीविनः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
कामक्रोधावनादृत्य धर्ममेवानुपालय़ेत् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
कामक्रोधावनादृत्य पितेव समदर्शनः ||
१३ ग
आदि पर्व
अध्याय
१६४
गन्धर्व उवाच
कामक्रोधावुभौ यस्य चरणौ संववाहतुः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
कामक्रोधोद्भवं दुःखमह्रीररतिरेव च ||
४९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
कामक्रोधोद्भवान्दोषान्निरस्य च नराधिपाः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
कामक्रोधौ च लोभं च मानं चोत्सृज्य दूरतः ||
११० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११४
वृहस्पतिरु उवाच
कामक्रोधौ च संय़म्य ततः सिद्धिमवाप्नुते ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
कामक्रोधौ ततः पश्चाज्जेतव्याविति मे मतिः ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
कामक्रोधौ पुरस्कृत्य योऽर्थं राजानुतिष्ठति |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
कामक्रोधौ प्रमादश्च लोभमोहौ भय़ं क्लमः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
कामक्रोधौ भय़ं निद्रा पञ्चमः श्वास उच्यते |
५४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
कामक्रोधौ भय़ं मोहमभिद्रोहमथानृतम् |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
कामक्रोधौ वशे कृत्वा दम्भं लोभमनार्जवम् |
५८ क