आदि पर्व
अध्याय
१२०
वैशम्पाय़न उवाच
कश्चित्सेनाचरोऽरण्ये मिथुनं तदपश्यत ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
कश्चिदर्थय़तेऽत्यर्थं तेनासि हरिणः कृशः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
कश्चिदाह्वय़तां सङ्ख्ये देशमन्यं प्रकर्षतु |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
कश्चिदेव हि भीतस्तु दृश्यते न परात्मनोः |
८२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
कश्चिद्दुःखे वर्तमानः सुखस्य स्मर्तुमिच्छति ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१२
वासुदेव उवाच
कश्चिद्दुःखे वर्तमानः सुखस्य स्मर्तुमिच्छति |
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
कश्चिद्दुर्योधनेत्येवं व्रुवन्तः प्रस्थितास्तदा ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
कश्चिद्द्विजातिप्रवरो वेदाध्याय़ी तपोधनः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्याध उवाच
कश्चिद्राजा मम सखा धनुर्वेदपराय़णः |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
कश्चिद्वाह्लीकमुख्यानां नातिहृष्टमना जगौ ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
कश्चिद्विप्रस्तपोय़ुक्तः काश्यपो धर्मवित्तमः |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
वासुदेव उवाच
कश्चिद्व्राह्मणमासीनमाचार्यं संशितव्रतम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
भीष्म उवाच
कश्चिद्व्राह्मणमासीनमाचार्यमृषिसत्तमम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
कश्चिन्नान्यः प्रिय़तरः कुन्तीपुत्रान्ममार्जुनात् ||
२३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
कश्चिन्महति संसारे वर्तमानो द्विजः किल |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
कश्चिन्महदवाप्नोति मा ते भूद्वुद्धिरीदृशी ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
कश्चेतय़ानो निवसेन्मुहूर्तमपि मानवः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
कश्चैनमस्तं नय़ति कस्मिंश्च प्रतितिष्ठति ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
कश्चैषां मानुषो भावः किमेषामसतामिव ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
कश्चैषां मानुषो भावः किमेषामसतामिव ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
कश्मलं चाविशत्तीव्रं विराटो भरतर्षभ |
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
४८
सूत उवाच
कश्मलं चाविशद्घोरं वासुकिं पन्नगेश्वरम् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
कश्मलं प्राविशद्घोरं दृष्ट्वा कर्णस्य विक्रमम् ||
२२ ग
विराट पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
कश्मलं प्राविशद्घोरं निर्मर्यादमवर्तत ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
कश्मलं प्राविशद्राजा वहु तत्र समादिशन् ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
कश्मलं यत्र पार्थस्य वासुदेवो महामतिः |
१५६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
कश्मलं सर्वभूतानां निशाय़ां समपद्यत ||
४० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
व्राह्मण उवाच
कश्मलं सहसागच्छद्भानुमन्तमिव ग्रहः ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
कश्मलाभिहता वीर वैराटी त्वभवत्तदा ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
कश्मलाभिहतो राजा चिन्तय़ामास पाण्डवः ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
कश्मलाभिहतो वीर ततोऽहमपय़ातवान् ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
कश्मलेनाभिपन्नोऽसि तेन ते विकृतं मनः ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
कश्यपश्च महातेजा ये चान्ये नानुकीर्तिताः ||
२० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
कश्यपस्तु महाराज प्रतिगृह्य महीमिमाम् |
६० क
उद्योग पर्व
अध्याय
९९
नारद उवाच
कश्यपस्य ततो वंशे जातैर्भूतिविवर्धनैः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२७
शौनक उवाच
कश्यपस्य द्विजातेश्च कथं वै पक्षिराट्सुतः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
विश्वावसुरु उवाच
कश्यपस्य पितुश्चैव पूर्वमेव मय़ा श्रुतम् |
६० क
आदि पर्व
अध्याय
२६
वृहस्पतिरु उवाच
कश्यपस्य मुनेः पुत्रो विनताय़ाश्च खेचरः |
३६ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
विदुर उवाच
कश्यपस्य वचः श्रुत्वा प्रह्लादः पुत्रमव्रवीत् |
७७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
कश्यपस्य सुराश्चैव असुराश्च सुतास्तथा |
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२१
राम उवाच
कश्यपाय़ मय़ा दत्ता कृत्स्ना नगरमालिनी ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४
सूत उवाच
कश्यपो धर्मपत्नीभ्यां मुदा परमय़ा युतः ||
६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१०८
सुपर्ण उवाच
कश्यपो भगवान्देवो वरुणं स्माभ्यषेचय़त् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
भीष्म उवाच
कश्यपोऽत्रिर्वसिष्ठश्च भरद्वाजोऽथ गौतमः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
कषाय़ं पाचय़ित्वा तु श्रेणिस्थानेषु च त्रिषु |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
कषाय़वर्जितं ज्ञानं येषामुत्पद्यतेऽचलम् |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
कष्टं युद्धे दश शेषाः श्रुता मे; त्रय़ोऽस्माकं पाण्डवानां च सप्त |
१५८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
कष्टं हीदं व्यवसितं पाण्डवेन महात्मना |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
कष्टः क्षत्रिय़धर्मोऽय़ं सौहृदं त्वय़ि यत्स्थितम् |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
कष्टा दारुणरूपेण घोररूपा निशाचरी |
२७ क