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अनुशासन पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
कल्मषं गुरुशुश्रूषा हन्ति मानो महद्यशः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९२
अग्निरु उवाच
कल्माषगोय़ुगेनाथ युक्तेन तरतो जलम् |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
कल्माषदण्डा गोविन्द विमला रथशक्तय़ः |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय १६६
गन्धर्व उवाच
कल्माषपाद इत्यस्मिँल्लोके राजा वभूव ह |
१ क
आदि पर्व
अध्याय १७३
गन्धर्व उवाच
कल्माषपादं राजर्षिमशपद्व्राह्मणी रुषा ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
कल्माषपादः सरसि निमज्जन्राक्षसोऽव्रवीत् ||
६७ ख
आदि पर्व
अध्याय १६७
गन्धर्व उवाच
कल्माषपादमासीनं ददर्श विजने वने ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
कल्माषा वहवो राजंश्चित्रवर्णाश्च भारत ||
१०० ग
उद्योग पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
कल्माषाङ्गास्तित्तिरिचित्रपृष्ठा; भ्रात्रा दत्ताः प्रीय़ता फल्गुनेन |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
कल्याण वत साक्षी त्वं मात्मानमवमन्यथाः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५६
भीष्म उवाच
कल्याणं कुरुते गाढं ह्रीमान्न श्लाघते क्वचित् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय ४५
जनमेजय़ उवाच
कल्याणं प्रतिपत्स्यामि विपरीतं न जातु चित् ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
कल्याणं भाषसे कृष्णे कुले जाता यथा वदेत् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७९
भीष्म उवाच
कल्याणं यदि वा पापं न तु नाशोऽस्य विद्यते ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
कल्याणगुणसम्पन्ना सर्वलक्षणपूजिता ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
कल्याणगोचरं कृत्वा मनस्तृष्णां निगृह्य च |
२० क
सभा पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
कल्याणमनसश्चैव व्राह्मणान्स्वस्ति वाच्य च ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
कल्याणमनुमन्तव्यं पुरुषेण वुभूषता |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
वृहस्पतिरु उवाच
कल्याणमाचरन्नेवं सर्वं पापं व्यपोहति ||
३३ ख
विराट पर्व
अध्याय १८
द्रौपद्यु उवाच
कल्याणरूपा सैरन्ध्री वल्लवश्चातिसुन्दरः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
कल्याणवाचः शकुना राजहंसाः; शुकाः क्रौञ्चाः शतपत्राश्च यत्र |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
कल्याणवृत्त आचार्यो मय़ा युधि निपातितः ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
कल्याणवृत्तः सततं हि राज; न्वैचित्रवीर्यस्य सुतो ममासीत् |
५५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
कल्याणवृत्ते कल्याणि नैवं त्वं वक्तुमर्हसि ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
कल्याणा वः सन्तु पतय़ोऽनुकूला; यूय़ं पतीनां भवतानुकूलाः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
कल्याणी रूपसम्पन्ना दुर्भगा शक्र दृश्यते |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२३
वासुदेव उवाच
कल्यानं कुरुते वाढं पापमस्मिन्न विद्यते |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
कल्योत्थानरता नित्यं गुरुशुश्रूषणे रता |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
कल्यौ स्वो भगवन्योद्धुमपि सर्वैः सुरासुरैः |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
कवचं च ध्वजश्चैव धनुः शक्तिर्हय़ा गदा |
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
कवचं चास्य सङ्क्रुद्धः शरैस्तीक्ष्णैरदारय़त् ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
कवचं भीमसेनस्य पातय़ामास साय़कैः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
कवचानां ध्वजानां च भविष्यति महान्क्षय़ः ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
कवचानां प्रभाभिश्च न प्राज्ञाय़त किञ्चन ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
कवचानां प्रभास्तत्र सूर्यरश्मिविचित्रिताः |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
कवचानां विचित्राणां भूषणानां प्रभास्तथा |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
कवचानि च शस्त्राणि कार्मुकं च पितामह ||
१०४ ग
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
कवचानि विचित्राणि दृढानि च मृदूनि च |
२० ख
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
कवचानि विचित्राणि दृढानि च मृदूनि च |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
कवचान्यथ चर्माणि चित्राण्यास्तरणानि च |
५४ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
कवचान्यवदीर्यन्ते शरैः संनतपर्वभिः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय १०८
वैशम्पाय़न उवाच
कवची निषङ्गी पाशी च दण्डधारो धनुर्ग्रहः ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
कवची निषङ्गी पाशी दण्डधारो धनुर्धरः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
कवची वद्धनिस्त्रिंशः सशरः सशरासनः |
१०५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
युधिष्ठिर उवाच
कवची स शरी खड्गी धन्वी च वरभूषणः ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
कवची स शरी खड्गी सधन्वा च विशां पते |
३८ क
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
कवची सतलत्राणो वद्धगोधाङ्गुलित्रवान् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय २८४
वैशम्पाय़न उवाच
कवचेन च संय़ुक्तः कुण्डलाभ्यां च मानद |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
कवचेन तथा युक्तो रक्षार्थं सैन्धवस्य च ||
३३ ख
विराट पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
कवचेन महार्हेण समनह्यद्वृहन्नडाम् ||
१९ ख