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कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
कर्णाद्धि मन्यते त्राणं नित्यमेव सुय़ोधनः |
६१ क
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
कर्णाभ्यां शिरसोऽङ्गेभ्यो लोमवर्त्मभ्य एव च |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
कर्णार्जुनविनाशेन मा नश्यत्वखिलं जगत् ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
कर्णार्जुनसहाय़ोऽहं जय़ेय़मपि वासवम् ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८
युधिष्ठिर उवाच
कर्णार्जुनाभ्यां सम्प्राप्ते द्वैरथे राजसत्तम |
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४३
कुन्त्यु उवाच
कर्णार्जुनौ वै भवतां यथा रामजनार्दनौ |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
कर्णावाकाशपाताले ललाटं भूतधारिणी |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३०
भीष्म उवाच
कर्णावेव पिधातव्यौ प्रस्थेय़ं वा ततोऽन्यतः ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
कर्णास्त्रं समरे प्राप्य दुर्निवारमनात्मभिः ||
१०४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
कर्णाय़ पुरुषव्याघ्र सुप्रीतेनान्तरात्मना ||
१५७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३०
सञ्जय़ उवाच
कर्णाय़ैव च दुर्धर्षश्चिक्षेपाजौ वृकोदरः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७५
भृगुरु उवाच
कर्णिका तस्य पद्मस्य मेरुर्गगनमुच्छ्रितः |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
कर्णिकाः कुन्तिकाश्चैव सौद्भिदा नलकालकाः |
५८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
कर्णिकारध्वजं चापि सिंहकेतुररिन्दमः |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
कर्णिकारमहास्रग्वी नीलमौलिः पिनाकधृक् ||
१३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
कर्णिकारमिवोद्धूतं वातेन मथितं नगात् |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णिकारमय़ीं मालां विभ्रत्पादावलम्विनीम् |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णिकारवनं रम्यं शिलाजालसमुद्गतम् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णिकारान्विरचितान्कर्णपूरानिवोत्तमान् |
५८ क
कर्ण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
कर्णिना द्रोणतनय़ं विव्याध मलय़ध्वजः ||
१९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णिनालीकदंष्ट्रस्य खड्गजिह्वस्य संय़ुगे |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
कर्णिनालीकनाराचा निर्हरन्ति शरीरतः |
७६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
कर्णिनालीकनाराचा वत्सदन्तोपवृंहणाः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय २९५
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णिनालीकनाराचानुत्सृजन्तो महारथाः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय २९६
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णिनालीकनाराचानुत्सृजन्भरतर्षभ |
२९ क
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
कर्णिनालीकनाराचैरास्तीर्य शय़नोत्तमम् |
१८ क
स्त्री पर्व
अध्याय १९
गान्धार्यु उवाच
कर्णिनालीकनाराचैर्भिन्नमर्माणमाहवे |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
कर्णिनालीकनाराचैश्छादय़ामास तद्वलम् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
कर्णिनालीकनाराचैस्तोमरैः प्रासशक्तिभिः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
कर्णिनैकेन विव्याध हृदय़े निशितेन ह ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
कर्णे चैश्वर्यमाधाय़ कथं त्वं भूतिमिच्छसि ||
६६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
कर्णे तु निहते वीरे रथव्याघ्रे नरर्षभे |
१०० क
कर्ण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णे सेनापतौ राजन्नभूदद्भुतदर्शनम् ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
कर्णे हते कुरवः प्राद्रवन्त; भय़ार्दिता गाढविद्धाश्च सङ्ख्ये |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
कर्णेन च कृतो राजा विमुखः शत्रुतापनः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३
सात्यकिरु उवाच
कर्णेन च निहत्याजावभिषेक्ष्याम पाण्डवम् ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
कर्णेन चेदिष्वेकेन पाञ्चालेषु च भारत |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
कर्णेन त्रास्यमानानामवस्थानं न विद्यते ||
२७ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णेन द्रौपदेय़ैर्वा पाञ्चाल्या वा सुमध्यया ||
४३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
कर्णेन निर्मितां वीर गुप्तां वीरैर्महारथैः ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
कर्णेन भग्नान्पाञ्चालान्द्रावय़न्वहु शोभते ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २९४
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णेन भरतश्रेष्ठ नान्यं वरमय़ाचत ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
कर्णेन भरतश्रेष्ठ पाण्डवानुज्जिहीर्षवः ||
९१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
कर्णेन मे महावाहो सर्वसैन्यस्य पश्यतः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
कर्णेन विजिता राजन्दुःशासनमनुव्रताः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
कर्णेन विजिताः पूर्वं सङ्ग्रामे शूरसंमताः |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
कर्णेन विहितं दृष्ट्वा दिव्यमस्त्रं घटोत्कचः |
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
कर्णेन विहितं राजन्निमेषार्धाददृश्यत ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
कर्णेन वृषसेनेन सैन्धवेन तथैव च |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
कर्णेन सहितः कृत्यं चिन्तय़ानस्तदैव हि ||
३७ ख