वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
कर्णः प्रहरतां श्रेष्ठः सर्वांश्चारीन्महारथः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
कर्णः प्राच्छादय़त्क्रुद्धो भीमं साय़कवृष्टिभिः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
कर्णः शरशतैश्चापि शैनेय़ं प्रत्यविध्यत ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४
नारद उवाच
कर्णः शस्त्रभृतां श्रेष्ठः पृष्ठतः पुरुषर्षभ ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
कर्णः शोकसमाविष्टो महोरग इव श्वसन् ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णः स सुमहावीर्यस्त्वय़ा वध्यो धनञ्जय़ ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णः सदा पाण्डवानां तन्मे दहति साम्प्रतम् ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
कर्णः स्मरतु दुष्टात्मा वचनं द्रोणभीष्मय़ोः ||
८३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
कर्णकौरवय़ोरेवं रणे सम्भाषमाणय़ोः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
कर्णचापच्युता वाणाः सम्पतन्तस्ततस्ततः |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
कर्णचापच्युतान्वाणान्वर्जय़ंस्तु नरोत्तमः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
कर्णचापच्युताश्चित्राः शरा वर्हिणवाससः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
कर्णचापच्युतैर्वाणैः प्राच्छाद्यत वृकोदरः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
कर्णचापच्युतैर्वाणैरपश्याम विनाकृतान् ||
११५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
कर्णचापच्युतैर्वाणैर्वध्यमानास्तु सोमकाः |
७३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
कर्णजङ्घश्च भगवान्गालवश्च महानृषिः |
५१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
कर्णतः समपद्यन्त खेचराणि वय़ांसि च ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
कर्णदुःशासनकृपैर्वृतो राजा महारथैः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णदुःशासनाभ्यां च त्वय़ा च वहुशः कृतम् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णदुःशासनाभ्यां च राजभिश्चाभिसंवृतम् ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णदुःशासनाभ्यां च राज्यमेतच्चिकीर्षति ||
१२ ग
स्त्री पर्व
अध्याय
१३
गान्धार्यु उवाच
कर्णदुःशासनाभ्यां च वृत्तोऽय़ं कुरुसङ्क्षय़ः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९१
भगवानु उवाच
कर्णदुर्योधनकृता सर्वे ह्येते तदन्वय़ाः ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णदुर्योधनकृपैर्गुप्तं शान्तनवेन च ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
कर्णदुर्योधनादीनां दुष्टं विज्ञाय़ मन्त्रितम् |
१४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
धृतराष्ट्र उवाच
कर्णदुर्योधनादीनां शकुनेः सौवलस्य च |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
कर्णदुर्योधनौ चापि निःश्वसेतां मुहुर्मुहुः |
२० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णदुर्योधनौ चोभौ शकुनिश्च महारथः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
कर्णद्रोणावतिक्रम्य समन्तात्पर्यवारय़त् ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
कर्णध्वजमुपातिष्ठत्सोऽवदीदभिनर्दय़न् ||
६७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
कर्णनासावनमनं दन्तदृष्टिविरागिता |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
कर्णपर्व ततो ज्ञेय़ं शल्यपर्व ततः परम् |
५९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
कर्णपाण्डवनिर्मुक्तैर्निर्मुक्तैरिव पन्नगैः |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
कर्णपार्षतय़ोर्मध्ये त्वदीय़ानां महारणः ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
कर्णपुत्रवधं दृष्ट्वा नकुलस्य च विक्रमम् |
४९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
कर्णपुत्रस्तु समरे हित्वा नकुलमेव तु |
३९ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
जनमेजय़ उवाच
कर्णपुत्राश्च विक्रान्ता राजा चैव जय़द्रथः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
कर्णपुत्रो महाराज वर्षमाण इवाम्वुदः ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णपुत्रो हतः शूरो वृषसेनो महावलः ||
३० ग
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
कर्णपुत्रौ च राजेन्द्र भ्रातरौ सत्यविक्रमौ |
५६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णप्रभृतय़श्चेमे त्वं चापि कवची रथी |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
कर्णप्रभृतय़श्चेमे नावतिष्ठन्ति पार्थिवाः ||
९१ ख
वन पर्व
अध्याय
२३८
दुर्योधन उवाच
कर्णप्रभृतय़श्चैव सुहृदो वान्धवाश्च ये |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
कर्णभीमौ महाराज पराक्रान्तौ महाहवे |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
कर्णमद्य नरश्रेष्ठ जह्याशु निशितैः शरैः ||
५८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
कर्णमभ्यर्दितं दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रेण मारिष |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
कर्णमभ्याहनच्चैव गजेन्द्रमिव केसरी ||
६४ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
कर्णमस्यन्तमिष्वस्त्रैर्विचेरुरमितौजसः ||
६७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
कर्णमाश्रित्य कौन्तेय़ धार्तराष्ट्रेण विग्रहः |
६३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
कर्णमाश्रित्य सङ्ग्रामे दर्पो दुर्योधने पुनः |
१८ क