अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
कदाचिन्मृगय़ां यात उद्भ्रान्तो गहने वने |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
कदाचिल्लभते प्रीतिं कदाचिदनुशोचति ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
कदाचिल्लभते प्रीतिं कदाचिदपि शोचते |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
कद्रूः सूक्ष्मवपुर्भूत्वा गर्भिणीं प्रविशेद्यदा |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
कद्रूश्च मनुजव्याघ्र दक्षकन्यैव भारत |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१४
सूत उवाच
कद्रूश्च लव्ध्वा पुत्राणां सहस्रं तुल्यतेजसाम् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
१९
सूत उवाच
कद्रूश्च विनता चैव भगिन्यौ ते तपोधन ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
कनकस्तम्भरुचिरं तोरणेन विराजितम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
कनकाङ्गदकेय़ूरैः कुण्डलैर्मणिभिः शुभैः |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
कनकोत्तमसङ्काशः प्रदीप्त इव पावकः |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
कनिष्ठाच्छ्रुतकर्मा तु सर्वे सत्यपराक्रमाः |
६६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०८
युधिष्ठिर उवाच
कनिष्ठाश्च यथा ज्येष्ठे वर्तेरंस्तद्व्रवीहि मे ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
कनिष्ठास्तं नमस्येरन्सर्वे छन्दानुवर्तिनः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
कनिष्ठिकाय़ाः पश्चात्तु देवतीर्थमिहोच्यते ||
९६ ख
सभा पर्व
अध्याय
४९
दुर्योधन उवाच
कनीय़ांसो विवर्धन्ते ज्येष्ठा हीय़न्ति भारत ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
कनीय़ान्मध्यमः श्रेष्ठ इति वेदविदो विदुः ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय
८०
यय़ातिरु उवाच
कनीय़ान्मम दाय़ादो जरा येन धृता मम |
२० ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
कन्दरांश्च नितम्वांश्च नदांश्चाद्भुतदर्शनान् |
१०५ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
कन्दराय़ां गिरीन्द्रस्य सिंहेनेव महाद्विपाः ||
६२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११६
नारद उवाच
कन्दरेषु च शैलानां नदीनां निर्झरेषु च |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४४
भीष्म उवाच
कन्दरेषु च शैलानां नदीनां निर्झरेषु च |
४ क
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
कन्दर्प इव रूपेण मूर्तिमानभवत्स्वय़म् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७८
वैशम्पाय़न उवाच
कन्दर्पवाणाभिनिपीडिताङ्गाः; कृष्णागतैस्ते हृदय़ैर्नरेन्द्राः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
११५
अकृतव्रण उवाच
कन्यकुव्जे महानासीत्पार्थिवः सुमहावलः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
कन्यकुव्जे महानासीत्पार्थिवो भरतर्षभ |
३ क
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
कन्यकुव्जेऽपिवत्सोममिन्द्रेण सह कौशिकः |
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
कन्या गर्भं समाधत्त भास्करान्मां जनार्दन |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
कन्या चैव कुमारश्च कृताहमनृणा त्वय़ा ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
कन्या चोत्पाद्य दातव्या कुलपुत्राय़ धीमते |
११८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
कन्या जज्ञे सुता तस्य वने निवसतः सतः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
२०७
वैशम्पाय़न उवाच
कन्या तु मम जातेय़ं कुलस्योत्पादनी ध्रुवम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
सावित्र्यु उवाच
कन्या तेजस्विनी सौम्य क्षिप्रमेव भविष्यति ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
कन्या ददृशुराय़ान्तीं कृष्णां क्लिष्टामनागसम् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६१
तपत्यु उवाच
कन्या नाभिलषेन्नाथं भर्तारं भक्तवत्सलम् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
कन्या भूत्वा पुमाञ्जातः स च योत्स्यति भारत |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
कन्या भूत्वा पुमाञ्जातो न योत्स्ये तेन भारत ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
कन्या भूत्वा पुमान्भावी इति चोक्तोऽस्मि शम्भुना ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
कन्या भूत्वा पुमान्भावीत्येवं चैतदुपेक्षितम् ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९०
द्रुपद उवाच
कन्या ममेय़ं सम्प्राप्ता यौवनं शोकवर्धिनी |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
कन्या शिखण्डिनी जाता पुरुषो वै निवेदितः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०४
वैशम्पाय़न उवाच
कन्या सती देवमर्कमाजुहाव यशस्विनी ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
कन्या सती देवमर्कमासादय़महं ततः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
कन्या सा रोहिणी नाम हिरण्यकशिपोः सुता |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
अर्जुन उवाच
कन्या ह्येषा पुरा जाता पुरुषः समपद्यत ||
१०० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
कन्यां कन्यां शतं नागा नागं नागं शतं रथाः ||
१०० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११७
नारद उवाच
कन्यां च तां वरारोहामिदमित्यव्रवीद्वचः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
भीष्म उवाच
कन्यां तां प्रतिगृह्यैव भार्यां परमशोभनाम् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११५
नारद उवाच
कन्यां निर्यातय़ामास स्थितः सत्ये महीपतिः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९०
भीष्म उवाच
कन्यां पञ्चालराजस्य सुतां तां वै शिखण्डिनीम् ||
१४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
भीष्म उवाच
कन्यां परमधर्मात्मा प्रीतिमांश्चाभवत्तदा ||
१८ ख