chevron_left  कथमर्थमनर्थाढ्यमर्जुनarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
कथमर्थमनर्थाढ्यमर्जुन त्वं प्रशंससि ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
युधिष्ठिर उवाच
कथमर्थाच्च धर्माच्च न हीय़ेत परन्तप ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
कथमर्थाच्च धर्माच्च न हीय़ेमहि माधव ||
७६ ख
वन पर्व
अध्याय ६९
वृहदश्व उवाच
कथमल्पवलप्राणा वक्ष्यन्तीमे हय़ा मम |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
दुःषन्त उवाच
कथमल्पेन कालेन शालस्कन्ध इवोद्गतः ||
७८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १९
धृतराष्ट्र उवाच
कथमल्पेन सैन्येन प्रत्यव्यूहत पाण्डवः ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
युधिष्ठिर उवाच
कथमव्यङ्गतामेति लक्षण्यो जाय़ते कथम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
कथमसि कूपे पतित इति ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५६
अर्जुन उवाच
कथमस्मद्धितार्थं ते कैश्च योगैर्जनार्दन |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ६५
मेनको उवाच
कथमस्मद्विधा वाला जितेन्द्रिय़मभिस्पृशेत् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
कथमस्मद्विधो नाम जानँल्लोकप्रवृत्तय़ः |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
कथमस्मद्विधो राजा परपूर्वां प्रवेशय़ेत् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
कथमस्मद्विधो व्रूय़ाद्भीतोऽस्मीत्ययशस्करम् |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
कथमस्मान्महाव्यूहादुद्यानं नो भविष्यति ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
कथमस्मासु जीवत्सु त्वय़ि चैव जनार्दन |
३७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७
संवर्त उवाच
कथमस्मि त्वय़ा ज्ञातः केन वा कथितोऽस्मि ते |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय ४२
जनमेजय़ उवाच
कथमस्मिंश्च तीर्थे वै आप्लुत्याकल्मषोऽभवत् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
कथमस्मिन्स इत्येव सम्वन्धः स्यादसंहितः ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४९
युधिष्ठिर उवाच
कथमस्य प्रय़ोक्तव्यः संस्कारः कस्य वा कथम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय ५२
वृहदश्व उवाच
कथमागमनं चेह कथं चासि न लक्षितः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
कथमाचरितं पार्थ त्वय़ा कर्म सुदुष्करम् ||
९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २६
वासुदेव उवाच
कथमात्मकृतं दोषं मय़्याधातुमिहेच्छसि ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
कथमादित्यसङ्काशं मृगी व्याघ्रं जनिष्यति ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
कथमादित्यसदृशं मृगी व्याघ्रं जनिष्यति ||
१६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
युधिष्ठिर उवाच
कथमापत्सु वर्तेत तन्मे व्रूहि पितामह ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
जनमेजय़ उवाच
कथमाप्लुत्य तस्मिंस्तु पुनराप्याय़ितः शशी |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
कथमाभ्यामभिध्यातः संसृष्टो दारुणेन वा |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय ३९
जनमेजय़ उवाच
कथमार्ष्टिषेणो भगवान्विपुलं तप्तवांस्तपः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
युधिष्ठिर उवाच
कथमाशा समुत्पन्ना या च सा तद्वदस्व मे ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ७६
देवय़ान्यु उवाच
कथमाशीविषात्सर्पाज्ज्वलनात्सर्वतोमुखात् |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
कथमासंश्च मे पुत्रा हीना भीष्मेण सञ्जय़ |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
धृतराष्ट्र उवाच
कथमासंस्तदा योधा हीना भीष्मेण सञ्जय़ |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
कथमासन्महाराजे धृतराष्ट्रे महात्मनि ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३९
युधिष्ठिर उवाच
कथमासां नराः सङ्गं कुर्वते कुरुनन्दन |
२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
कथमासीद्धतैश्वर्यो गान्धारी च यशस्विनी ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
युधिष्ठिर उवाच
कथमाय़ुरवाप्नोति कथं भवति सत्त्ववान् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३९
वाय़ुरु उवाच
कथमिच्छति मां दातुं द्विजेभ्यो व्रह्मणः सुताम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय १५८
अर्जुन उवाच
कथमिच्छसि तां रोद्धुं नैष धर्मः सनातनः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय २०५
वैशम्पाय़न उवाच
कथमित्यव्रवीद्वाचा शोकार्तः सज्जमानय़ा |
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
कथमिन्दीवरश्यामं सुदंष्ट्रं चारुलोचनम् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९
युधिष्ठिर उवाच
कथमिन्द्रेण राजेन्द्र सभार्येण महात्मना |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
कथमिन्द्रोपमं वीरं मृत्युर्युद्धे समस्पृशत् ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
कथमिष्ट्वा नरव्याघ्र मय़ि मिथ्या प्रवर्तसे ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
कथमुक्त्वा तथासत्यं सुप्तामुत्सृज्य मां गतः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
कथमुत्सहसे जेतुं सकृष्णान्सर्वपाण्डवान् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४८
युधिष्ठिर उवाच
कथमुत्सादितं क्षत्रं कथं वृद्धिं पुनर्गतम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ५८
वृहदश्व उवाच
कथमुत्सृज्य गच्छेय़महं त्वां विजने वने ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
कथमुत्सृज्य गन्तासि वश्यां भार्यामनुव्रताम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
कथमुत्सृज्य राज्यं स्वं धनधान्यसमाचितम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
कथमुत्सृज्य वैदेहीं वने राक्षससेविते |
११ क