आदि पर्व
अध्याय
१६
विष्णुरु उवाच
क्षोभ्यतां कलशः सर्वैर्मन्दरः परिवर्त्यताम् ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
क्षोभ्यमाणमसम्वाधं ग्राहेणेव महत्सरः ||
८० ख
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
क्षोभ्यमाणा महावातैः सा नौस्तस्मिन्महोदधौ |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
क्षोभय़ध्वं महावेगाः पवनाः सागरं यथा ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
क्षोभय़न्तं तदा सेनां द्विरदं नलिनीमिव |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
क्षोभय़न्ति स्म तां सेनां मकराः सागरं यथा ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
क्षोभय़ित्वा चमूं सर्वां नलिनीमिव कुञ्जरः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१००
भीष्म उवाच
क्षोभय़ेय़ुरनीकानि सागरं मकरा इव ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
क्षौमं कार्पासिकं वापि मृगाजिनमथापि वा |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
क्षौमं च कुशचीरं च कौशेय़ं वल्कलानि च |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
क्षौमं च वस्त्रमादाय़ शशो जन्तुः प्रजाय़ते ||
१०१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
क्षौमावदाते महति स्पर्ध्यास्तरणसंवृते |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
क्ष्वेडाः किलकिलाः शङ्खाः क्रकचा गोविषाणिकान् |
४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
क्ष्वेडाः किलकिलाशव्दाः क्रकचा गोविषाणिकाः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
क्ष्वेडाः किलकिलाशव्दाः प्रादुरासन्महीपते |
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
क्ष्वेडाः किलिकिलाशव्दान्क्रकचान्गोविषाणिकाः |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
क्ष्वेडितास्फोटितरवैः सिंहनादरवैरपि |
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
क्ष्वेडितास्फोटितरवैर्वाणशव्दैश्च सर्वशः |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
क्ष्वेडितास्फोटितोत्क्रुष्टैः सुभीमाः सर्वतोदिशम् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
क्ष्वेडितास्फोटितोत्क्रुष्टैस्तुमुलं सर्वतोऽभवत् ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
क्ष्वेडितास्फोटितोत्क्रुष्टैस्तुमुलं सर्वतोऽभवत् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
क्षय़ं गच्छन्ति वै सर्वे सृज्यन्ते च पुनः पुनः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
क्षय़ं च दृष्ट्वा शैलानां क्षय़ं च सरितां तथा ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
क्षय़ं जगाम सा रात्रिर्लोमशं चाविशद्भय़म् ||
१०८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
क्षय़ं धनानां च तथा पुनर्वृद्धिं तथैव च ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
क्षय़ं निनीषुर्निशितैर्भीमो विव्याध पत्रिभिः ||
११ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
क्षय़ं नीतं कुलं दीप्तं पृथिवीराज्यमिच्छता ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
क्षय़ं नीता हि पृतना भवता महती मम ||
६३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
क्षय़ं नीतोऽस्मि वार्ष्णेय़ राज्यहेतोः पराक्रमी |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
क्षय़ं नीतोऽस्मि वार्ष्णेय़ राज्यहेतोः पराक्रमी |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
क्षय़ं नय़ति राधेय़ः पाञ्चालाञ्शतशो रणे ||
१०० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
क्षय़ं मनुष्यदेहानां गजवाजिरथक्षय़म् |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
क्षय़ं मनुष्यदेहानां रथनागाश्वसङ्क्षय़म् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
क्षय़ं महान्तं कुरुसृञ्जय़ानां; निवेदय़न्ते पाण्डवानां जय़ं च ||
९३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
क्षय़ं याता हि राजानो दुर्योधनकृते भृशम् ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
क्षय़ं वृद्धिं च चन्द्रस्य दृष्ट्वा प्रत्यक्षतस्तथा ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
क्षय़ं शत्रोः सञ्चय़ं पालनं चा; प्युभौ चार्थौ सहितौ धर्मकामौ |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
क्षय़ं संवत्सराणां च मासानां प्रक्षय़ं तथा ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
क्षय़ः स त्विह मन्तव्यो यं लव्ध्वा वहु नाशय़ेत् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
क्षय़ः स्थानं च वृद्धिश्च त्रिवर्गमपरं तथा ||
६७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
क्षय़मद्य गता युद्धे पश्य दैवं यथाविधम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
क्षय़व्ययभय़ोपाय़ैः कर्शय़न्तीतरेतरम् ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
क्षय़ाच्चैवास्य देवेश प्रजाश्चापि गताः क्षय़म् ||
६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
क्षय़ान्ते तत्फलं दिव्यं ज्ञानं ज्ञेय़प्रतिष्ठितम् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
क्षय़े चोभय़तो राजन्कं धर्ममनुपश्यसि ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
क्षय़े तस्मिन्महारौद्रे निर्विशेषमजाय़त ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
क्षय़े सङ्कर्षणः प्रोक्तस्तमुपास्यमुपास्महे ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
क्षय़ोदय़ोऽय़ं सुमहान्कुरूणां प्रत्युपस्थितः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
क्षय़ोदय़ौ विपुलौ संनिशाम्य; तस्मादल्पं नावमन्येत विद्वान् ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
युधिष्ठिर उवाच
कय़ा च वृत्त्या वर्तेत तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख