द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
क्षुरान्तं वालसूर्याभं मणिवज्रविभूषितम् |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
क्षुरान्तममलं चक्रं कालान्तकय़मोपमम् |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
क्षुरान्तमुद्यम्य भुजेन चक्रं; रथादवप्लुत्य विसृज्य वाहान् ||
८६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२८
सूत उवाच
क्षुरान्तैर्ज्वलितैश्चापि चक्रैरादित्यरूपिभिः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
क्षुराभ्यां चक्ररक्षौ च कलिङ्गस्य महावलौ |
६९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
क्षुराभ्यां पाण्डवश्रेष्ठस्तत उच्चुक्रुशुर्जनाः ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
क्षुरार्धचन्द्रैर्निशितैश्च वाणैः; शिरांसि तेषां वहुधा च वाहून् ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
क्षुरेण शितधारेण तत्पपात महावने ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
क्षुरेण शितधारेण प्रचकर्त नराधिपः ||
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
क्षुरेण सहदेवस्य ध्वजं चिच्छेद काञ्चनम् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
क्षुरेणापाहरत्तूर्णं ततो मत्स्याः प्रदुद्रुवुः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
क्षुरेणास्य तृतीय़ेन शिरश्चिच्छेद सात्यकिः ||
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
क्षुरैः क्षुरप्रैर्भल्लैश्च पीतैरञ्जलिकैरपि |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
क्षुरैः प्रचिच्छेद सहैव पाण्डव; स्ततो द्विपं वाणशतैः समार्दय़त् ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
क्षुरैर्गाण्डीवनिर्मुक्तैर्नातिय़त्नादिवार्जुनः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
क्षुरैर्भल्लार्धचन्द्रैश्च छिन्नाः शस्त्राणि तत्यजुः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
२७१
मार्कण्डेय़ उवाच
क्षुरैश्चिच्छेद लघ्वस्त्रं सौमित्रिः प्रतिदर्शय़न् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
क्षुरैश्चिच्छेद वीभत्सुर्द्विधैकैकं त्रिधैव च ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
क्षुव्धतोय़ा महाघोषाः श्वसमाना इवाशुगाः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
क्षुव्धसागरसङ्काशः क्षुभितः सर्वतोऽभवत् ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
क्षुव्धस्य हि समुद्रस्य प्रावृट्काले यथा निशि ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षुव्धास्तेनाथ शव्देन भोजवृष्ण्यन्धकास्तदा |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
क्षुव्धय़ोर्वाय़ुना राजन्द्वय़ोरिव समुद्रय़ोः ||
२५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
क्षेत्रं कर्मजमाप्नोति शुभं वा यदि वाशुभम् ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशय़ति भारत ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
क्षेत्रं च तपसां श्रेष्ठं पश्याम्याश्रममुत्तमम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
क्षेत्रं जानाति चाव्यक्तं क्षेत्रज्ञ इति चोच्यते |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
क्षेत्रं धर्मस्य कृत्स्नस्य कुरुक्षेत्रमवातरन् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
क्षेत्रं पुरुषकारस्तु दैवं वीजमुदाहृतम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
भीष्म उवाच
क्षेत्रं वै कर्मणां योनिः सद्भावः सत्यमुच्यते ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७७
भगवानु उवाच
क्षेत्रं हि रसवच्छुद्धं कर्षकेणोपपादितम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
क्षेत्रक्षेत्रज्ञतत्त्वज्ञाः स्वय़ज्ञपरिनिष्ठिताः |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंय़ोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
क्षेत्रक्षेत्रज्ञय़ोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
क्षेत्रक्षेत्रज्ञय़ोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
क्षेत्रक्षेत्रज्ञय़ोर्व्यक्तिं वुवुधे देवदर्शनः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
युधिष्ठिर उवाच
क्षेत्रजं केचिदेवाहुः सुतं केचित्तु शुक्रजम् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
भीष्म उवाच
क्षेत्रजो वाप्यपसदो येऽध्यूढास्तेषु चाप्यथ |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
क्षेत्रज्ञ इति चाप्यन्यो गुणस्तत्र चतुर्दशः |
१०५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
क्षेत्रज्ञ इति तं विद्याद्यस्तं वेद स वेदवित् ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३४
वासुदेव उवाच
क्षेत्रज्ञ इति यश्चोक्तः सोऽहमेव धनञ्जय़ ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
क्षेत्रज्ञं तं विजानीहि नित्यं त्यागजितात्मकम् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८०
भृगुरु उवाच
क्षेत्रज्ञं तं विजानीहि नित्यं लोकहितात्मकम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३३
भीष्म उवाच
क्षेत्रज्ञं तं विजानीय़ान्नित्यं त्यागजितात्मकम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
क्षेत्रज्ञः सर्वभूतानां तस्मादहमजः स्मृतः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
क्षेत्रज्ञः सर्वभूतानामादिरन्तश्च केशव |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१८४
तार्क्ष्य उवाच
क्षेत्रज्ञभूतां परलोकभावे; कर्मोदय़े वुद्धिमतिप्रविष्टाम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०४
गुरुरु उवाच
क्षेत्रज्ञमेवानुय़ाति पांसुर्वातेरितो यथा |
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
भीष्म उवाच
क्षेत्रज्ञवित्पार्थिव ज्ञानय़ज्ञ; मुपास्य वै तत्त्वमृषिर्भविष्यसि ||
१०७ ख