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शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
भीष्म उवाच
क्षीय़ते हि सदा सोमः पुनश्चैवाभिपूर्यते ||
५४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
क्षीय़न्ते सर्वसैन्यानि कुरूणां पाण्डवैः सह |
६३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
क्षीय़माणे ततः सोमे ओषध्यो न प्रजज्ञिरे |
५८ क
आदि पर्व
अध्याय १०७
वैशम्पाय़न उवाच
क्षुच्छ्रमाभिपरिग्लानं द्वैपाय़नमुपस्थितम् |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षुतकीटावपन्नं च यच्चोच्छिष्टाशितं भवेत् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
क्षुत्तृट्शीतोष्णदोषैश्च वर्जितं शोकनाशनम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
क्षुत्परीतः सुविमनास्तदप्येकं व्यसर्जय़त् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
क्षुत्पिपासातपसहः कृशो धमनिसन्ततः |
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
क्षुत्पिपासातपसहः कृशो धमनिसन्ततः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
क्षुत्पिपासादय़ो भावा जिता यस्येह देहिनः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय १६२
गन्धर्व उवाच
क्षुत्पिपासापरिश्रान्तं तर्कय़ामास तं नृपम् |
७ क
विराट पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षुत्पिपासापरिश्रान्ता विदेशस्था विचेतसः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
क्षुत्पिपासापरिश्रान्तास्ते योधास्तव भारत |
७२ क
आदि पर्व
अध्याय २०१
नारद उवाच
क्षुत्पिपासापरिश्रान्तौ जटावल्कलधारिणौ |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
क्षुत्पिपासापरिश्रान्तौ शास्त्रमालम्व्य जल्पतः ||
१०३ ख
वन पर्व
अध्याय ५९
वृहदश्व उवाच
क्षुत्पिपासापरिश्रान्तौ सभां काञ्चिदुपेय़तुः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ६४
वृहदश्व उवाच
क्षुत्पिपासापरीता च दुष्करं यदि जीवति ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
क्षुत्पिपासापरीताङ्गा विसञ्ज्ञा वहवोऽभवन् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २९५
वैशम्पाय़न उवाच
क्षुत्पिपासापरीताङ्गाः पाण्डवाः समुपाविशन् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
क्षुत्पिपासापरीतात्मा हिंसार्थी चाप्यवैक्षत ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
क्षुत्पिपासापरीताश्च श्रान्ताश्च पतिता भुवि |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
क्षुत्पिपासापरीताश्च सर्वभोगवहिष्कृताः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८३
भृगुरु उवाच
क्षुत्पिपासाश्रमकृतैरुपतापैरुपतप्यन्ते |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
क्षुत्पिपासाश्रमाविष्टो मुनिरुद्दालकिस्तदा |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८३
भृगुरु उवाच
क्षुत्पिपासाश्रमो नास्ति न जरा न च पापकम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
क्षुत्पिपासे च वाय़ुं च जय़ नित्यं जितेन्द्रिय़ः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २९८
वैशम्पाय़न उवाच
क्षुत्पिपासे च सर्वेषां क्षणे तस्मिन्व्यगच्छताम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
क्षुत्पिपासे जहौ राजा हर्षं चावाप पुष्कलम् ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
क्षुत्स्वादुतां जनय़ति सा चाढ्येषु सुदुर्लभा ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
क्षुद्धर्मं दूषय़त्यत्र हरिष्यामि श्वजाघनीम् ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
क्षुद्धर्मसञ्ज्ञां प्रणुदत्यादत्ते धैर्यमेव च |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २५२
धौम्य उवाच
क्षुद्रं कृत्वा फलं पापं प्राप्स्यसि त्वमसंशय़म् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
क्षुद्रं क्रूरं तथा प्राज्ञं शूरं चार्थविशारदम् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय २२२
जरितो उवाच
क्षुद्रं गृहीत्वा पादाभ्यां भय़ं न भविता ततः ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
क्षुद्रं ज्ञातिवधं प्राहुर्मा कुरुष्व ममाप्रिय़म् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
क्षुद्रं हृदय़दौर्वल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
क्षुद्रः क्षुद्रसहाय़श्च स्वपक्षक्षय़मातुरः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
क्षुद्रः पापसमाचारः सर्वशङ्की तथालसः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
क्षुद्राक्षेणेव जालेन झषावपिहितावुभौ |
६३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
क्षुद्राक्षेणेव जालेन झषावपिहितावुभौ |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
क्षुद्रादन्यत्र चाचारात्तन्ममाचक्ष्व सत्तम ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
क्षुद्रेणोक्ता हीनसत्त्वा मानुषाः किं निवर्तथ ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
क्षुद्रो वैदेहकादन्ध्रो वहिर्ग्रामप्रतिश्रय़ः ||
२५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २३
कुन्त्यु उवाच
क्षुधा कथं न सीदेतामिति चोद्धर्षणं कृतम् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
क्षुधा निर्णुदति प्रज्ञां धर्म्यां वुद्धिं व्यपोहति |
६५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
भीष्म उवाच
क्षुधा परमय़ा युक्ताश्छन्द्यमाना महात्मभिः |
८३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
क्षुधा परिगतो धीमान्समन्तात्पर्यधावत ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय ५८
वृहदश्व उवाच
क्षुधा सम्पीड्यमानस्तु नलो वहुतिथेऽहनि |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
क्षुधापरिगतज्ञानो धृतिं त्यजति चैव ह ||
६५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
नकुल उवाच
क्षुधापरिगतां ज्ञात्वा सक्तूंस्तान्नाभ्यनन्दत ||
१९ ख