शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
क्लिश्यन्नपि सुतस्नेहैः पिता स्नेहं न मुञ्चति ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
क्लिश्यमानः कुदारेण कुचैलेन वुभुक्षय़ा ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
क्लिश्यमानमनङ्गेन त्वत्सङ्कल्पोद्भवेन वै |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
क्लिश्यमानां च पाञ्चालीं विकर्ण इदमव्रवीत् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
२७
सूत उवाच
क्लिश्यमानान्मन्दवलान्गोष्पदे सम्प्लुतोदके ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
क्लिश्यमानान्विमार्गेषु कामक्रोधावृतात्मनः |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय
२०
भीमसेन उवाच
क्लिश्यमानापि सुश्रोणी राममेवान्वपद्यत ||
१० ख
स्त्री पर्व
अध्याय
७
विदुर उवाच
क्लिश्यमानाश्च तैर्नित्यं हन्यमानाश्च भारत |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
युधिष्ठिर उवाच
क्लिश्यमानेषु भूतेषु तैस्तैर्भावैस्ततस्ततः |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
क्लिश्यमानेषु भूतेषु न स क्लिश्यति केनचित् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
कृप उवाच
क्लिश्यमानेषु सैन्येषु वध्यमानेषु राजसु |
१०४ क
वन पर्व
अध्याय
२२७
वैशम्पाय़न उवाच
क्लिष्टावरण्ये पश्येय़ं कृष्णय़ा सहिताविति ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
क्लीवं धर्मघृणाय़ुक्तं न लोको वहु मन्यते ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
क्लीवता व्यवसाय़श्च लाभालाभौ जय़ाजय़ौ ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
क्लीवस्य वाक्ये तिष्ठामो यथैवाशक्तय़स्तथा ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
क्लीवस्य हि कुतो राज्यं दीर्घसूत्रस्य वा पुनः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
क्लीवाश्चान्धाश्च जाय़न्ते वधिरा लम्वचूचुकाः |
३५ ख
सभा पर्व
अध्याय
३४
शिशुपाल उवाच
क्लीवे दारक्रिय़ा यादृगन्धे वा रूपदर्शनम् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४३
व्यास उवाच
क्लेदनं शोकमनसोः सन्तापं तृष्णय़ा सह |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२९५
वैशम्पाय़न उवाच
क्लेशमार्छन्त विपुलं सुखोदर्कं परन्तपाः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
क्लेशांश्च विविधान्कृष्ण सर्वांस्तानपि वेत्थ नः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
क्लेशांस्तितिक्षसे राजन्नान्यः कश्चित्प्रशंसति ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
क्लेशाः प्रतिनिवर्तन्ते केषाञ्चिदसमीक्षिताः |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१
कृष्ण उवाच
क्लेशानसह्यांश्च तितिक्षमाणै; र्यथोषितं तद्विदितं च सर्वम् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
क्लेशान्कृतान्सपुत्रेण त्वय़ा पूर्वं नराधिप ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
क्लेशान्मुमुक्षुः परजान्स वै पुरुष उच्यते ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
क्लेशितश्च वने शूरो वासवेन च शिक्षितः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
क्लेशिता हि त्वय़ा पार्था धर्मपाशसितास्तदा |
४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
क्लेशिताश्च वने नित्यं तत एतत्कृतं मय़ा ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
क्लेशेन याति महता विनश्यत्यन्तरापि वा ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
क्लेशैर्विप्रं योऽफलैः संय़ुनक्ति; तस्यावीर्याश्चाफलाश्चैव लोकाः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
क्लेशैस्तीव्रैर्युज्यमानः सपत्नैः; क्षमां कुर्वन्कालमुपासते यः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
क्लैव्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय़्युपपद्यते |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
क्व आरुणिः पाञ्चाल्यो गत इति ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
क्व क्षत्रिय़ा यास्यथ नैष धर्मः; सतां पुरस्तात्कथितः पुराणैः |
७९ क
वन पर्व
अध्याय
२७८
नारद उवाच
क्व गताभूत्सुतेय़ं ते कुतश्चैवागता नृप |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
भीष्म उवाच
क्व गतो न निवर्तेत तन्मे व्रूहि महामुने ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
क्व गतो भगवान्भद्रे तन्ममाचक्ष्व शोभने ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
व्यास उवाच
क्व गतोऽसि कुतो वेदमप्रीतिस्थानमागतम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
क्व गमिष्यथ भद्रं वस्त्यक्त्वास्मान्दुःखभागिनः |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
भीमसेन उवाच
क्व गमिष्यसि राजेन्द्र निक्षिप्तकवचाय़ुधः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
क्व च कर्माणि तिष्ठन्ति जन्तोः प्रेतस्य भार्गव ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
युधिष्ठिर उवाच
क्व च तत्साम्प्रतं द्रव्यं भगवन्नवतिष्ठते |
२ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
क्व च ते भ्रातरो मह्यं तन्ममाख्यातुमर्हसि |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
क्व च ते सुहृदस्तेषामाह्वय़न्तो रणे तदा ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
दुःषन्त उवाच
क्व च त्वमेवं कृपणा तापसीवेषधारिणी ||
७७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
क्व च भीष्मो गतवय़ा मन्दात्मा कालमोहितः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
दुर्योधन उवाच
क्व च युद्धमिदं भूय़ः कालो हि दुरतिक्रमः ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
क्व च युद्धविमर्दो वा मन्त्राः सुव्याहृतानि वा |
२२ क