वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
को भवान्कस्य वा किं ते क्रिय़तां कार्यमुच्यताम् ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११९
नारद उवाच
को भवान्कस्य वा वन्धुर्देशस्य नगरस्य वा ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
को भवान्किंनिमित्तं वा वानरं वपुराश्रितः |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
को मदन्यः पुमाँल्लोके न जह्यात्सूत जीवितम् ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
धृतराष्ट्र उवाच
को मन्त्रः पाण्डवेष्वासीत्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२८४
कर्ण उवाच
को मामेवं भवान्प्राह दर्शय़न्सौहृदं परम् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
को यज्ञः सर्वय़ज्ञानां वरिष्ठ उपलक्ष्यते |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
को राज्यमभिपद्येत प्राप्य चोपशमं लभेत् ||
१५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
को वा कुरून्द्रोणभीष्माभिगुप्ता; नश्वत्थाम्ना शल्यकृपादिभिश्च |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
को वा दुर्योधनं शक्तः प्रतिय़ोधय़ितुं रणे ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
को वा मम पिता लोके अहमेव पितामहः ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
को वा मुखमनीकानामासीत्कर्णे निपातिते |
५९ क
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
को वा समय़भेत्तारं वुधः संमन्तुमर्हति ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
शल्य उवाच
को वानिलं निगृह्णीय़ात्पिवेद्वा को महार्णवम् ||
५८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
को वाप्यन्यो मत्समोऽस्ति क्षमाय़ां; तथा क्रोधे सदृशोऽन्यो न मेऽस्ति ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
को वेह स पुमानस्ति यो विजेष्यति पाण्डवम् |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
को हि कृष्णास्ति नस्त्वादृक्सर्वनिश्चय़वित्सुहृत् ||
७८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३
सात्यकिरु उवाच
को हि गाण्डीवधन्वानं कश्च चक्राय़ुधं युधि |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
को हि गाण्डीवधन्वानं ज्वलन्तमिव तेजसा |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
को हि गाण्डीवधन्वानं नरः सोढुं रणेऽर्हति ||
२० ग
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
को हि गाण्डीवधन्वानमन्यः कुरुपितामहात् |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
को हि जानन्नभिजनमात्मनः क्षत्रिय़ो नृप |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
को हि जानाति कस्याद्य मृत्युसेना निवेक्ष्यते ||
१४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
धृतराष्ट्र उवाच
को हि जीवितमन्विच्छन्प्रतीपं पाण्डवं व्रजेत् |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
को हि जीवेत्पदातीनां भवेदश्वेषु संशय़ः |
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
को हि तत्रैव भुक्त्वान्नं भाजनं भेत्तुमर्हति |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
को हि तद्वेद कस्याद्य मृत्युसेना निवेक्ष्यते ||
७२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
को हि तान्विषहेद्योद्धुं मर्त्यधर्मा धनुर्धरः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५
कर्ण उवाच
को हि तिष्ठति दुर्धर्षे द्रोणे व्रह्मविदुत्तमे |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१९२
धृतराष्ट्र उवाच
को हि द्रुपदमासाद्य मित्रं क्षत्तः सवान्धवम् |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
को हि द्रोणं च भीष्मं च भगदत्तं च मारिष |
५१ क
सभा पर्व
अध्याय
३४
शिशुपाल उवाच
को हि धर्मच्युते पूजामेवं युक्तां प्रय़ोजय़ेत् |
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
को हि धर्मिणमात्मानं जानञ्ज्ञानवतां वरः |
२० क
सभा पर्व
अध्याय
४३
दुर्योधन उवाच
को हि नाम पुमाँल्लोके मर्षय़िष्यति सत्त्ववान् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
को हि नाम प्रमत्ताय़ परेण सह युध्यते |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
नारद उवाच
को हि नाम भवेत्तस्य तेजसा यशसा श्रिय़ा |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
को हि नाम भवेनार्थी भवेत्कारणतत्त्ववित् ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
को हि नाम भवेनार्थी साहसेन समाचरेत् ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
को हि नाम समानेषु राजसूदात्तकर्मसु |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
को हि नेच्छेत्प्रिय़ं पुत्रं जीवन्तं शाश्वतीः समाः |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
को हि पाण्डुसुतं युद्धे विषहेत धनञ्जय़म् ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
को हि मां भीमसेनाद्य क्षितावर्हति पार्थिवः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४८
नाग उवाच
को हि मां मानुषः शक्तो द्रष्टुकामो यशस्विनि |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
को हि मूढो व्यवस्येत शत्रोर्दातुं वसुन्धराम् ||
६१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
को हि मे जीवितेनार्थस्तमृते पुरुषर्षभम् |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
१४०
वैशम्पाय़न उवाच
को हि मे भोक्तुकामस्य विघ्नं चरति दुर्मतिः |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
को हि राज्यं परित्यज्य सर्वस्वं चात्मना सह |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
को हि राधासुतं कर्मं शक्तो योधय़ितुं रणे |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
को हि लोकस्य कुरुते विनाशप्रभवावुभौ |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
को हि वन्धुः कुलीनः संस्तथा व्रूय़ात्सुहृज्जने |
२९ क