द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
कृष्णास्तु मेघसङ्काशाः सहदेवमुदाय़ुधम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१८७
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णाहेतोरनुप्राप्तान्दिवः सन्दर्शनार्थिनः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णाय़ महते नित्यं धर्मो धारय़ति प्रजाः ||
६६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
पुत्र उवाच
कृष्णाय़सस्येव च ते संहत्य हृदय़ं कृतम् |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
कृष्णाय़ाः प्रेष्यवद्भूत्वा शुश्रूषां कुरुते सदा ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
कृष्णाय़ाः शक्नुय़ां गन्तुं पदं केशप्रधर्षणे ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
कृष्णाय़ाश्च परिक्लेशं संस्मरन्पुरुषो भव ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
कृष्णाय़ाश्च परिक्लेशं सभामध्ये दुरात्मभिः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णाय़ाश्चरता प्रीतिं येन क्रोधवशा हताः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णाय़ास्तत्र पश्यन्तः क्रीडितान्यमरप्रभाः |
४३ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णाय़ै दर्शय़ामास भीमसेनो महावलः ||
६० ख
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णे धनुर्वेदरतिप्रधानाः; सत्यव्रतास्ते शिशवः सुशीलाः |
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय
१४
भीम उवाच
कृष्णे नय़ो मय़ि वलं जय़ः पार्थे धनञ्जय़े |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णे मा भूत्तवोत्कण्ठा मा व्यथा मा प्रजागरः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
श्रीभगवानु उवाच
कृष्णे युगे च सम्प्राप्ते कृष्णवर्णो भविष्यसि ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
कृष्णे वसानो वसने महात्मा; सत्यानृते यो विविनक्ति लोके ||
१५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
कृष्णे वा देवकीपुत्रे मोहितो देवमाय़या |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
कृष्णेत्येवाव्रुवन्कृष्णां कृष्णाभूत्सा हि वर्णतः |
५० क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णेन निहते चैद्ये चचाल च वसुन्धरा ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णेन भरतस्त्रीभिर्ये च पौराः समागताः ||
१६ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
कृष्णेन मुनिना विप्र निय़तं सत्यवादिना ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णेन वाक्यमुक्तोऽसि सुहृदां शममिच्छता |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णेन समुपेतेन जहृषे भारतं पुरम् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
कृष्णेन सहितं युद्धे कुन्तीपुत्रं धनञ्जय़म् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णेन सहितः पार्थः स्वराज्यं प्राप्य केवलम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४४
कर्ण उवाच
कृष्णेन सहितात्को वै न व्यथेत धनञ्जय़ात् |
९ क
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
कृष्णेन हि जिता युद्धे वहवः क्षत्रिय़र्षभाः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
कृष्णो न धर्मं सञ्जह्यात्सर्वे ते च त्वदन्वय़ाः ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
कृष्णो यस्य प्रसीदेत लोकास्तेनाक्षय़ा जिताः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
कृष्णो वर्णश्च मे यस्मात्तस्मात्कृष्णोऽहमर्जुन ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
कृष्णो वा देवकीपुत्रो नान्यो वै वेद कश्चन |
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
कृष्णो वापि भवेल्लोके पार्थो वापि धनुर्धरः |
७३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णो हि देवकीपुत्रो देवैरपि दुरुत्सहः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
कृष्णो हि मूलं पाण्डूनां पार्थः स्कन्ध इवोद्गतः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२५२
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णोरगौ तीक्ष्णविषौ द्विजिह्वौ; मत्तः पदाक्रामसि पुच्छदेशे |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
कृष्णोऽहः कर्मचेष्टाय़ां शुक्लः स्वप्नाय़ शर्वरी ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८३
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णोऽहमस्मीति निपीड्य पादौ; युधिष्ठिरस्याजमीढस्य राज्ञः ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
कृष्णौ च पुरुषव्याघ्रौ तच्च सत्यं व्रवीमि ते |
३५ क
शल्य पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
कृष्णौ चापि महेष्वासावभिवाद्य हलाय़ुधम् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
कृष्णौ संमोहय़न्माय़ां विदधे शकुनिस्ततः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णय़ा चैव वीभत्सुर्धर्मपुत्रमपूजय़त् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णय़ा सह तत्रासीद्धर्मराजो युधिष्ठिरः ||
११ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णय़ा सहदेवेन विजय़ेन च धीमता ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णय़ा सहिता वीरा व्राह्मणैश्च महात्मभिः |
२४ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
इन्द्र उवाच
कृष्णय़ा सहितान्सर्वान्मा शुचो भरतर्षभ ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णय़ानुगतौ तत्र नृवीरौ तौ विरेजतुः ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
कृष्णय़ोः सदृशो वीर्ये सात्यकिः शत्रुकर्शनः |
७३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
कृष्णय़ोर्युधि संरव्धो भीष्मो व्यावारय़द्दिशः ||
६१ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
कृष्यन्ते दक्षिणामाशां रक्तमाल्यानुलेपनाः ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
जाजलिरु उवाच
कृष्या ह्यन्नं प्रभवति ततस्त्वमपि जीवसि |
२ क